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राजस्थान का अनोखा गवरी नृत्य: 40 दिन पुरुष निभाते हैं देवी-देवताओं की भूमिकाएं

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राजस्थान का अनोखा गवरी नृत्य: 40 दिन पुरुष निभाते हैं देवी-देवताओं की भूमिकाएं

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न मेकअप उतारते हैं, न घर जाते हैं, नहाना भी मना

सुभाष शर्मा
उदयपुर । 29 अगस्त

राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में हर साल सावन-भादो में आयोजित होने वाला गवरी नृत्य आदिवासी भील समाज की समृद्ध संस्कृति और परंपराओं का अनूठा प्रतीक है। यह लोक नाट्य 40 दिनों तक चलता है, जिसमें केवल पुरुष ही भाग लेते हैं। खास बात यह है कि एक बार श्रृंगार करने के बाद ये कलाकार पूरे आयोजन तक मेकअप नहीं उतारते और न ही नहाते हैं।
मेल या फीमेल सभी किरदार पुरुष निभाते हैं
गवरी में शिव-पार्वती समेत सभी देवी-देवताओं के पात्रों को पुरुष ही निभाते हैं। महिलाएं इसमें भाग नहीं लेतीं, लेकिन आयोजन के दौरान 40 दिन तक व्रत रखकर सहयोग देती हैं। इस नृत्य के माध्यम से कलाकार सामाजिक और पौराणिक संदेश भी देते हैं जैसे—महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण आदि।
20-25 साल बाद आता है गांव का नंबर
गवरी का आयोजन हर साल अलग-अलग गांवों में होता है। एक गांव का नंबर दोबारा आने में 20 से 25 साल लगते हैं। इसी वजह से जहां भी यह आयोजन होता है, वहां के लोग चाहे देश के किसी भी कोने में क्यों न हों, अपने गांव लौटकर इस आयोजन में भाग लेते हैं।
हर घर से एक पुरुष की भागीदारी जरूरी
गवरी में हर साल भाग लेने वाले नरेंद्र मीणा ने बताया कि यूं तो वह साल भर ठेकेदारी का काम करता है, लेकिन गवरी में भाग लेना ना केवल उसकी बल्कि उनके समुदाय की परंपरा नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी मानी जाती है। हर घर से कम से कम एक पुरुष सदस्य का भाग लेना आवश्यक होता है। जो पात्र किसी कलाकार को सौंपा जाता है, वह पीढ़ी दर पीढ़ी उसी परिवार में चलता है।
कठिन व्रत और नियमों का पालन
कलाकार आयोजन के दौरान हरी सब्जियां नहीं खाते, चप्पल नहीं पहनते और श्रृंगार को कभी जमीन पर नहीं रखते। रंग-रोगन हल्दी, आटा और पत्तियों के रस से बनाया जाता है। इस दौरान ‘गलावण’ (मूर्ति निर्माण) से ‘वलावण’ (विसर्जन) तक की प्रक्रिया देवी पार्वती को समर्पित होती है।

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