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‘राजस्थान में गर्मी नहीं, यहां के लोग गर्म थे’

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‘राजस्थान में गर्मी नहीं, यहां के लोग गर्म थे’

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चित्तौड़ गाथा: इतिहासकार चकलोई का कटाक्ष

चित्तौड़गढ़, 31 अगस्त
इंदिरा गांधी प्रियदर्शनी ऑडिटोरियम में रविवार को आयोजित ‘चित्तौड़ गाथा’ कार्यक्रम ने मेवाड़ के वीरता भरे इतिहास को जीवंत कर दिया। प्रसिद्ध इतिहासकार राजवीर सिंह चकलोई ने इस अवसर पर महाराणा सांगा और मेवाड़ की गौरवगाथा पर विस्तृत चर्चा की। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि विकृत इतिहास को चुनौती दी जाए और नई पीढ़ी को सच्चे इतिहास से परिचित कराया जाए।
सांसद के बयान पर नाराजगी
हाल ही में समाजवादी पार्टी सांसद रामजी लाल सुमन ने संसद में कहा था कि महाराणा सांगा ने बाबर को भारत बुलाया था। चकलोई ने इस बयान को तथ्यहीन बताते हुए तीखी आलोचना की। उन्होंने कहा कि इतिहास एक पक्ष का नहीं होता, लेकिन बिना पढ़े गलत बातें कहना संसद जैसे मंच के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।
महाराणा सांगा की दूरदर्शिता और वीरता
इतिहासकार ने विस्तार से बताया कि महाराणा सांगा ने अपनी रियासत से सैकड़ों किलोमीटर दूर जाकर युद्ध लड़े। खतौली (कोटा) चित्तौड़ से 285 किमी दूर है, वहां भी सांगा ने जीत दर्ज की। इब्राहिम लोदी को हराने के लिए वे 470 किमी दूर जाकर लड़े।
चकलोई ने तर्क दिया कि ऐसा योद्धा बाबर को मदद के लिए बुलाएगा, यह बात समझ और तर्क दोनों के खिलाफ है। उन्होंने पूछा कि यदि बाबर और सांगा मित्र थे, तो बयाना का युद्ध क्यों हुआ?
“राजस्थान में गर्मी नहीं, लोग गर्म थे”
चकलोई ने बाबर की लिखी बातों का जिक्र किया कि वह राजस्थान की गर्मी से बचने आया ही नहीं। इस पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा, “राजस्थान में गर्मी नहीं, यहां के लोग ज्यादा गर्म थे, इसलिए बाबर यहां ठहर नहीं सका।”
चित्तौड़ विचारधारा और लोकतंत्र की परंपरा
इतिहासकार ने कहा कि चित्तौड़ सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि विचारधारा है—जो गिरकर भी खड़े होकर लड़ना सिखाती है। उन्होंने याद दिलाया कि महाराणा प्रताप को गद्दी पर बैठाने का फैसला जनता ने लिया था, जो मेवाड़ की लोकतांत्रिक परंपरा को दर्शाता है। ‘चित्तौड़ गाथा’ कार्यक्रम में ऑडिटोरियम खचाखच भरा रहा। बड़ी संख्या में युवा मौजूद थे और बाहर तक लोग खड़े होकर इतिहासकार की बातें सुनते रहे।
इतिहास से सीखने की जरूरत
कार्यक्रम के अंत में चकलोई ने कहा कि इतिहास सिर्फ पढ़ने की चीज नहीं है, बल्कि उससे साहस, कर्तव्य और आत्मसम्मान की सीख मिलती है। मेवाड़ ने हमेशा देश को यह शिक्षा दी कि कर्तव्य के लिए कैसे लड़ा जाता है और कभी हार नहीं माननी चाहिए।

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