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रूपाजी-करपाजी की शहादत बनी आजादी की मशाल

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रूपाजी-करपाजी की शहादत बनी आजादी की मशाल

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जन्माष्टमी पर भी होती है भगवान की तरह पूजा, शहीदों की स्मृति में बने स्मारक और पैनोरमा

उदयपुर, 16 अगस्त: बेगूं-बिजौलियां किसान आंदोलन ने अंग्रेजी हुकूमत को हिलाकर रख दिया था। 84 तरह के लगान और विदेशी वस्तुओं के विरोध से उपजा यह आंदोलन राजस्थान ही नहीं, पूरे देश की आजादी की लड़ाई में मील का पत्थर साबित हुआ। बेगूं के गोविंदपुरा गांव में 23 जुलाई 1923 को हुए गोलीकांड में किसान नेता रूपाजी और करपाजी शहीद हो गए। ग्रामीण आज भी जन्माष्टमी सहित सभी पर्वों पर उनकी पूजा भगवान की तरह करते हैं।
विजय सिंह पथिक बने सूत्रधार
इस आंदोलन के सूत्रधार ‘राजस्थान केसरी’ विजय सिंह पथिक थे। दुर्गा प्रसाद चौधरी, माणिक्य लाल वर्मा, साधू सीताराम दास और भंवरलाल शर्मा सहित कई सेनानियों ने इसमें योगदान दिया। पथिक के नेतृत्व में मेनाल भैरु कुण्ड सहित कई गांवों में किसानों की बैठकों से आंदोलन को दिशा मिली।
शहादत से दहली अंग्रेजी सत्ता
टैक्स संबंधी मांगों को लेकर गोविंदपुरा में पांच माह तक चली किसान बैठक को भंग करने ब्रिटिश कमीश्नर ट्रेंच फौज लेकर पहुंचा। बैठक से बाहर निकले पंच रूपाजी पर गोली चला दी गई, जिससे वे शहीद हो गए। तुरंत बाद करपाजी भी शहीद हो गए। भगदड़ में कई किसानों को गिरफ्तार कर पगड़ियों से बांधकर घसीटा गया और जेलों में ठूंस दिया गया।
गांधीजी ने भी सराहा आंदोलन
1918 में बिजौलियां और 1921 में बेगूं में आंदोलन शुरू हुआ। महात्मा गांधी ने इसकी सराहना की और कहा कि किसानों का यह संघर्ष असहयोग आंदोलन से पहले ही स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त कर रहा है।
गीत और जनजागरण से बढ़ा हौसला
माणिक्य लाल वर्मा का गीत ‘पंछिड़ा…’ किसानों में जागरण का माध्यम बना। किसानों ने लाग, बाग, लाता, ब्याह और चंवरी जैसे लगानों के खिलाफ संघर्ष किया तथा विदेशी वस्त्रों की होली जलाई। अंग्रेजों के अत्याचार इतने थे कि गिरफ्तार किसानों को पशुओं की तरह उल्टा डालकर पानी पिलाया जाता और महिलाओं तक को नहीं छोड़ा जाता।
शहीदों की स्मृति में बने स्मारक
गोविंदपुरा में रूपाजी-करपाजी का स्मारक और करीब दो करोड़ की लागत से पैनोरमा बनाया गया है। जयनगर और अमरपुरा में भी उनकी स्मृतियां संजोई गई हैं। बेगूं कॉलेज और गोविंदपुरा स्कूल का नामकरण उनके नाम पर किया गया है। शहीद दिवस पर यहां श्रद्धांजलि सभा होती है और ग्रामीण उनकी मूर्तियों की पूजा करते हैं।

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