आपकी देह के अंत:स्थल में प्रभु को पहचानो: पं.व्यास
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सेक्टर 9 में श्रीमद्भागवत मर्मज्ञ पं.गोपालकृष्ण व्यास का श्रीमद् भागवत पर प्रवचन
उदयपुर। 30 अगस्त
जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है। एक न एक दिन सभी को मृत्यु का वरण करना ही है। यह जानते हुए भी ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट कृति मानव काम, क्रोध, लोभ, मोह, धन, ऐश्वर्य, संपन्नता, वैभव, ईर्ष्या, द्वेष में डूबा हुआ है, जो सर्वथा झूठ है, मिथ्या है। जो एकत्र किया है वह सब यही रह जाना है। धर्म की समझने की जरूरत है। इसलिए इंसान को प्रभु की महिमा को समझ कर उसे पाने का प्रयत्न करना चाहिए। और, प्रभु और कहीं नहीं आपकी देह के अंत:स्थल में ही है। बस जरूरत है तो उसे पहचानने की, उसकी भक्ति में डूबने की।
यह व्याख्यान सूरत के रहवासी श्रीमद् भागवत मर्मज्ञ पंडित श्री गोपालकृष्ण शास्त्री, जो मूलतः उदयपुर के हैं, ने यहां सेक्टर 9 स्थित भव्य पंडाल में नौ दिवसीय श्रीमद् भागवत महापुराण ज्ञान यज्ञ के तीसरे दिन भक्तों, धर्मावलंबियों को यथार्थ का ज्ञान कराते हुए दिया। उन्होंने कहा कि आज मानव जो भ्रम पाले हुए हैं कि वह सबकुछ है, सब कुछ उसके हाथ में है, परन्तु नहीं, वह भूल जाता है कि वह इस नश्वर संसार में जन्म के समय ही मृत्यु को साथ लेकर पैदा हुआ है। इस भ्रम को दूर करने के लिए उसे अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करना होगा। किंतु बुद्धि भी तीन प्रकार की होती है, निर्मल, मलिन और अमल। बुद्धि निर्मल यानी शुद्ध, मलिन यानी विकृत और अमल यानी इन दोनों स्तर से ऊपर। अर्थात अमल प्रकार की बुद्धि भगवद भक्ति, प्रभु को पाने के लिए उत्तम और उपयुक्त है। बुद्धि के इस स्तर को प्राप्त करने के लिए मानव को हमारे उन कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास, सूतजी, शौनकजी, नारदजी इत्यादि देवत्व प्राप्त ऋषि मुनियों से प्रेरणा लेने की जरूरत है, जिन्होंने वेद, पुराण, उपनिषद की रचना की है। कथा की आयोजक श्रीमती सरला शर्मा और उनका परिवार है
