केंद्र बोला– राज्य सुप्रीम कोर्ट में रिट नहीं दे सकते
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राष्ट्रपति-राज्यपाल फैसलों पर जवाबदेह नहीं; डेडलाइन मामले पर SC में सुनवाई
नई दिल्ली। 28 अगस्त
सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को राज्यों द्वारा दायर उस याचिका पर सुनवाई हुई जिसमें राज्यपाल और राष्ट्रपति द्वारा विधानसभा से पारित विधेयकों पर लंबे समय तक कार्रवाई न करने के खिलाफ डेडलाइन तय करने की मांग की गई है। केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट में इस तरह की रिट पिटीशन दायर नहीं कर सकतीं।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट में दलील दी कि संविधान का अनुच्छेद 32 केवल नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए है, न कि राज्यों के लिए। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति ने खुद यह सवाल उठाया है कि क्या राज्यों को इस तरह का अधिकार है। साथ ही, अनुच्छेद 361 का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति और राज्यपाल अपने फैसलों के लिए न्यायालय के प्रति जवाबदेह नहीं हैं।
केंद्र ने कहा कि राष्ट्रपति और राज्यपाल के निर्णय न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं आते और कोर्ट उन्हें किसी तरह का निर्देश नहीं दे सकती। हालांकि, बेंच ने टिप्पणी की कि यदि कोई राज्यपाल छह महीने तक बिल लंबित रखता है तो यह स्थिति भी उचित नहीं मानी जा सकती।
चीफ जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है। यह मामला तब उठा जब तमिलनाडु सरकार और राज्यपाल के बीच बिलों को रोककर रखने को लेकर विवाद हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल को अपने आदेश में कहा था कि राज्यपाल के पास किसी भी बिल को अनिश्चितकाल तक रोकने का अधिकार नहीं है। साथ ही, राष्ट्रपति को भेजे गए बिल पर तीन महीने में फैसला लेना होगा।
बाद में 15 मई को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी और अनुच्छेद 200 व 201 से जुड़े 14 सवाल उठाए। अब कोर्ट इन सवालों पर विस्तृत सुनवाई कर रहा है।
