सीतामाता सेंचुरी में दिखी स्टील से भी मजबूत जाला बुनने वाली मकड़ी
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गोल्डन सिल्क स्पाइडर के रेशे से बन सकते हैं बुलेटप्रूफ जैकेट और सर्जिकल धागे
सुभाष शर्मा
उदयपुर, 8 अक्टूबर: राजस्थान की सीतामाता सेंचुरी में दुर्लभ प्रजाति की गोल्डन सिल्क ऑर्ब-वीवर मकड़ी (नेफिला पिलिप्स) नजर आई है। इसे सहायक वन संरक्षक (ACF) राम मोहन मीणा ने जाला बुनते हुए कैमरे में कैद किया। वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस मकड़ी का रेशम स्टील से पांच गुना ज्यादा मजबूत होता है और इसका उपयोग भविष्य में बुलेटप्रूफ जैकेट व सर्जिकल स्टिचिंग में किया जा सकता है।
प्रकृति की बायो इंजीनियर: अनोखी जाल बुनने की कला
वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. सुनील दुबे ने बताया कि गोल्डन सिल्क मकड़ी का रेशम दो खास प्रोटीन — ग्लाइसिन और एलानिन — से बना होता है। ग्लाइसिन रेशे को लचीला बनाता है जबकि एलानिन उसे मजबूती देता है। जब मकड़ी रेशम खींचती है, तो ये प्रोटीन एक दिशा में जुड़कर बेहद मजबूत और हल्का रेशम बनाते हैं। यही कारण है कि इसे प्रकृति की “बायो इंजीनियर” कहा जाता है।
सुनहरी चमक और आकर्षक रंग
इस मकड़ी का जाला सूरज की रोशनी में सोने जैसा चमकता है, इसलिए इसे गोल्डन सिल्क स्पाइडर कहा जाता है। मादा मकड़ी का आकार लगभग 4 सेंटीमीटर तक होता है, जबकि नर केवल 6 मिलीमीटर का होता है। मादा के शरीर पर पीले, भूरे और काले रंग की धारियां होती हैं, जो इसे जंगल के वातावरण में छिपने में मदद करती हैं।
जंगल के संतुलन में अहम भूमिका
गोल्डन सिल्क मकड़ी मच्छर, पतंगे और मक्खियां जैसे कीट खाकर जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखती है। यह इंसानों के लिए हानिकारक नहीं है और काटने पर केवल हल्की जलन होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस मकड़ी की खोज राजस्थान की जैव विविधता के अध्ययन के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
