राजनारायण बनाम इंदिरा गांधी से लेकर लोकतंत्र की पुनर्स्थापना तक
— डॉ. विजय विप्लवी, पूर्व पार्षद, उदयपुर
25 जून 1975 भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की वह तिथि है, जिसे स्वतंत्र भारत के सबसे काले अध्याय के रूप में स्मरण किया जाता है। इसी दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने देश में आंतरिक आपातकाल लागू कर दिया। इसके साथ ही संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए, प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई और हजारों राजनीतिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों तथा सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ताओं को जेलों में डाल दिया गया। इस वर्ष उस घटना के पचास वर्ष पूर्ण हो रहे हैं, जिसने भारतीय राजनीति की दिशा ही बदल दी।
आपातकाल की पृष्ठभूमि 12 जून 1975 को तैयार हुई, जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने ऐतिहासिक निर्णय देते हुए रायबरेली से श्रीमती इंदिरा गांधी के निर्वाचन को निरस्त कर दिया। उनके प्रतिद्वंद्वी समाजवादी नेता राजनारायण ने आरोप लगाया था कि चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया गया था। न्यायालय ने इन आरोपों को सही मानते हुए उनका निर्वाचन रद्द कर दिया तथा छह वर्षों तक चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी।
इस निर्णय से सत्ता के गलियारों में भूचाल आ गया। श्रीमती गांधी ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील की। न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर ने उन्हें प्रधानमंत्री बने रहने की सीमित राहत तो दी, किंतु सांसद के रूप में अधिकारों पर रोक लगा दी। विपक्ष ने इसे नैतिक पराजय मानते हुए त्यागपत्र की मांग प्रारंभ कर दी। लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में देशभर में आंदोलन तेज हो गया। कांग्रेस के भीतर भी चंद्रशेखर और रामधन जैसे नेताओं ने विरोध के स्वर उठाए।
राजनीतिक संकट के बीच 25 जून 1975 की मध्यरात्रि को राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद ने प्रधानमंत्री की सलाह पर आपातकाल की घोषणा पर हस्ताक्षर कर दिए। अगले ही कुछ घंटों में लोकतंत्र का स्वर दबा दिया गया। जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फर्नांडिस, मधु लिमये, मधु दंडवते, राजनारायण, पीलू मोदी, प्रकाश सिंह बादल तथा राजस्थान के प्रमुख जनसंघ नेता भैरोंसिंह शेखावत सहित हजारों नेताओं को मीसा और डीआईआर के अंतर्गत गिरफ्तार कर जेलों में डाल दिया गया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी शासन ने विशेष लक्ष्य बनाया। 30 जून 1975 को नागपुर रेलवे स्टेशन पर संघ के तत्कालीन सरसंघचालक पूजनीय बालासाहब देवरस को गिरफ्तार कर लिया गया। 4 जुलाई 1975 को संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। संघ के हजारों स्वयंसेवक जेलों में भेज दिए गए तथा हजारों भूमिगत होकर लोकतंत्र की रक्षा के संघर्ष में जुट गए। शासन को विश्वास था कि संघ के संगठनात्मक ढांचे को तोड़कर विरोध की आवाज समाप्त की जा सकेगी, किंतु हुआ इसका ठीक विपरीत। संघ का कार्यकर्ता तंत्र भूमिगत रहकर जनजागरण और प्रतिरोध का केंद्र बन गया।
पूजनीय बालासाहब देवरस ने जेल से अनेक पत्र लिखकर लोकतंत्र की बहाली की मांग की। अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेता जेलों में रहते हुए भी लोकतांत्रिक संघर्ष के प्रतीक बने रहे। जॉर्ज फर्नांडिस को हथकड़ियों और बेड़ियों में अदालत लाया गया। उनकी वह तस्वीर पूरी दुनिया में आपातकाल के दमनकारी स्वरूप का प्रतीक बन गई।
आपातकाल के दौरान प्रेस की स्वतंत्रता समाप्त कर दी गई। समाचार पत्रों को सरकारी सेंसर की अनुमति के बिना कुछ भी प्रकाशित करने का अधिकार नहीं था। अनेक अखबारों ने विरोध स्वरूप अपने संपादकीय स्तंभ खाली छोड़ दिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंट दिया गया और नागरिकों के न्यायिक अधिकार तक सीमित कर दिए गए।
14 नवम्बर 1975 से लोकतंत्र की पुनर्स्थापना के लिए देशव्यापी सत्याग्रह प्रारंभ हुआ। नानाजी देशमुख के संयोजन में हजारों कार्यकर्ता सड़कों पर उतरे। बाजारों, चौराहों, सरकारी कार्यालयों और सार्वजनिक समारोहों में सत्याग्रह कर गिरफ्तारियां दी गईं। 26 जनवरी 1976 तक चले इस सत्याग्रह में लगभग पौने दो लाख लोगों ने स्वेच्छा से गिरफ्तारियां दीं। इनमें सर्वाधिक संख्या संघ तथा उसके प्रेरित संगठनों के कार्यकर्ताओं की थी।
देशभर में लगभग 45 हजार लोग मीसा और डीआईआर के अंतर्गत जेलों में बंद किए गए। असंख्य लोगों को बिना किसी विधिक प्रक्रिया के प्रताड़ित किया गया। राजस्थान में भी अनेक हृदयविदारक घटनाएं सामने आईं। पाली में सत्याग्रहियों को बिजली के झटके दिए गए। ज्ञानदास वैष्णव की श्रवण शक्ति प्रभावित हो गई। बांसवाड़ा के नवनीतलाल निनामा को अमानवीय यातनाएं दी गईं, जिनके दुष्प्रभाव जीवन भर बने रहे।
उदयपुर में छात्र भूपाल सिंह बाबेल को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। उन्होंने दसवीं बोर्ड की परीक्षा जेल से आकर दी। मेडिकल छात्र भरत मथुरिया ने स्वतंत्रता दिवस समारोह में सत्याग्रह किया और पुलिस की बर्बरता झेली। जनसंघ के प्रदेशाध्यक्ष एवं विधायक भानुकुमार शास्त्री मीसा में बंद थे। उनके तीनों भाई भी जेल में थे। परिवार को निरंतर पुलिस प्रताड़ना सहनी पड़ी। अपनी बहन के विवाह में कन्यादान के लिए उन्हें पैरोल मिली और विवाह के तुरंत बाद वे पुनः जेल लौट गए। यह प्रसंग लोकतंत्र सेनानियों के त्याग और समर्पण का अद्भुत उदाहरण है।
संघ के स्वयंसेवकों ने भूमिगत रहकर समाचार बुलेटिन, पत्रक और गुप्त साहित्य के माध्यम से जनजागरण का कार्य जारी रखा। अकेले राजस्थान में 32 स्थानों से भूमिगत बुलेटिन प्रकाशित किए गए। प्रेस सेंसरशिप के बावजूद लोकतंत्र की लौ बुझने नहीं दी गई। यह संघर्ष स्वतंत्रता आंदोलन की याद दिलाने वाला था।
आपातकाल के दौरान संजय गांधी के पाँच सूत्रीय कार्यक्रम और विशेष रूप से जबरन नसबंदी अभियान ने जनता में व्यापक असंतोष पैदा किया। प्रशासन लक्ष्य पूरा करने के लिए निरंकुश हो गया। भय और दमन का वातावरण पूरे देश में व्याप्त था। जनता स्वयं को असहाय अनुभव करने लगी थी।
अंततः जनता की लोकतांत्रिक चेतना और सत्याग्रहियों के संघर्ष के आगे सत्ता को झुकना पड़ा। 21 मार्च 1977 को आपातकाल समाप्त हुआ और आम चुनाव घोषित किए गए। जेलों में साथ संघर्ष करने वाले विपक्षी दलों ने जनता पार्टी का गठन किया। चुनाव परिणामों में जनता ने अभूतपूर्व निर्णय दिया। श्रीमती इंदिरा गांधी रायबरेली से और संजय गांधी अमेठी से चुनाव हार गए। पहली बार केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने।
यह चुनाव परिणाम भारतीय लोकतंत्र की शक्ति और जनता की लोकतांत्रिक चेतना का ऐतिहासिक प्रमाण था। जनता ने स्पष्ट संदेश दिया कि संविधान, स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकार किसी भी व्यक्ति या सत्ता से बड़े हैं।
आपातकाल की विभीषिका को नई पीढ़ी तक पहुँचाने तथा लोकतांत्रिक मूल्यों के महत्व का स्मरण कराने के उद्देश्य से भारत सरकार ने 25 जून को “संविधान हत्या दिवस” के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। यह दिवस हमें स्मरण कराता है कि 25 जून 1975 को सत्ता बचाने के लिए संविधान की आत्मा, नागरिकों के मौलिक अधिकारों और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर अभूतपूर्व प्रहार किया गया था।
संविधान हत्या दिवस केवल अतीत की एक घटना का स्मरण नहीं है, बल्कि लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, न्यायपालिका की स्वायत्तता और नागरिक अधिकारों की रक्षा का राष्ट्रीय संकल्प भी है। यह उन हजारों लोकतंत्र सेनानियों, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों, जनसंघ, समाजवादी और अन्य विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं के त्याग और संघर्ष को श्रद्धापूर्वक नमन करने का अवसर है, जिन्होंने कारावास, यातनाएं और प्रताड़नाएं सहकर भी लोकतंत्र की मशाल बुझने नहीं दी।
आपातकाल का इतिहास केवल दमन की कथा नहीं, बल्कि लोकतंत्र की विजय गाथा भी है। यह हमें चेतावनी देता है कि लोकतंत्र की रक्षा निरंतर जागरूकता से ही संभव है तथा यह प्रेरणा देता है कि जब भी संविधान, स्वतंत्रता और नागरिक डअधिकारों पर संकट आए, तब राष्ट्रहित में खड़े होने का साहस समाज में बना रहना चाहिए।