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भारतीय भाषाओं में इंटरनेट कंटेंट 0.1% से भी कम

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भारतीय भाषाओं में इंटरनेट कंटेंट 0.1% से भी कम

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70% भारतीयों को डिजिटल साक्षरता का अभाव, स्कूल स्तर पर बदलाव जरूरी: विवेकानंद पाणी
उदयपुर, 10 अक्टूबर:
भारत में जहां 70 प्रतिशत लोग भारतीय भाषाएं पढ़ने और लिखने में सक्षम हैं, वहीं डिजिटल साक्षरता के मामले में यह आंकड़ा लगभग नगण्य है।
उदयपुर आए सॉफ्टवेयर इंजीनियर एवं रेवरी लैंग्वेज टेक्नोलॉजी, बेंगलुरु के सह संस्थापक विवेकानंद पाणी ने बताया कि भारतीय भाषाओं के उपयोगकर्ता डिजिटल माध्यम में काफी पिछड़े हैं। अंग्रेजी भाषा के उपयोगकर्ताओं को डिजिटलीकरण अपनाने में आसानी रही क्योंकि कंप्यूटर और डिजिटल डिवाइस की शुरुआत अंग्रेजी में हुई थी। अधिकतर डिवाइस, एप्लीकेशन और सेवाएं अंग्रेजी उपयोगकर्ताओं को ध्यान में रखकर डिजाइन की गई हैं।
भारतीय भाषाएं डिजिटल दुनिया में पिछड़ीं
पाणी के अनुसार यह भ्रम है कि भारतीय भाषाएं अब डिजिटल रूप से सक्षम हैं। वास्तविकता यह है कि हम जो लिख सकते हैं, वैसा कंप्यूटर के लिए करना अभी संभव नहीं है। डिजिटल जुड़ाव केवल ई-कॉमर्स, बैंकिंग या सरकारी सेवाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह रोजमर्रा के संचार और ज्ञान साझा करने का माध्यम है।
उन्होंने बताया कि इंटरनेट पर भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कंटेंट मात्र 0.1% से भी कम है। एक्सेस या इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी अब मुख्य समस्या नहीं है, बल्कि दो बुनियादी जरूरतें हैं — एक, तकनीक का भारतीय भाषाओं के अनुरूप विकास, और दूसरा, इन भाषाओं का डिजिटल उपयोग सहज बनाना। इसके लिए स्कूलों में डिजिटल भाषा शिक्षा को शामिल करना होगा।
फॉन्ट और तकनीकी समर्थन का अभाव
पाणी ने बताया कि भारतीय भाषाओं में सर्च इंजन, स्पेल चेकर और टेक्स्ट एनालिसिस जैसे टूल्स की सटीकता बहुत सीमित है, क्योंकि भाषाई संरचना और डिजिटल प्रस्तुति अस्पष्ट है। भारतीय भाषाओं के पास फॉन्ट्स के भी बहुत कम विकल्प हैं। यूनिकोड में इन भाषाओं की संरचना अंग्रेजी से भिन्न होने के कारण डिजिटल संगतता सीमित है।
उन्होंने कहा कि 2000 के दशक तक भारतीय भाषाओं का फॉन्ट उद्योग तेजी से विकसित हो रहा था, लेकिन अब यह लगभग ठहर गया है।
स्कूल-कॉलेज स्तर पर डिजिटल बदलाव की जरूरत
पाणी ने कहा कि आज अधिकांश लोग मोबाइल और टैबलेट के जरिए डिजिटल दुनिया से जुड़ते हैं। आने वाली पीढ़ी को डिजिटल रूप से सशक्त बनाने के लिए स्कूल और कॉलेज स्तर से ही बदलाव की शुरुआत करनी होगी, ताकि भारतीय भाषाएं तकनीकी रूप से मजबूत बन सकें और इंटरनेट पर इनका प्रतिनिधित्व बढ़ सके।

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