महापंचायत त्रासदी: डूंगरपुर, राजसमंद और प्रतापगढ़ की 740 पंचायतों का ‘दिवाला’ निकला, जयपुर में बजट की फाइलें गुम!
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एक साल से नहीं मिली विकास की किश्त; सरपंचों को ‘लेनदारों’ ने घेरा, होली पर मजदूरों के चूल्हे बुझने की नौबत
डूंगरपुर, 3 फरवरी: प्रदेश की ‘गांव की सरकार’ इस समय वेंटिलेटर पर है। राजस्थान के डूंगरपुर, राजसमंद और प्रतापगढ़ जिलों में पंचायती राज व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। केंद्र और राज्य सरकार की ओर से दी जाने वाली विकास की महत्वपूर्ण किश्त पिछले एक साल से शासन सचिवालय और ‘सिस्टम’ की फाइलों में दफन होकर रह गई है। ताज्जुब की बात यह है कि प्रदेश के अन्य पड़ोसी जिलों में बजट का आवंटन सुचारू रूप से हो रहा है, लेकिन इन तीन जिलों की 740 पंचायतों को ‘वित्तीय सूखे’ की ओर धकेला जा रहा है।
पंचायतें अब केवल कागजों पर सिमट कर रह गई हैं। बुनियादी सुविधाओं और प्रशासनिक खर्चों के लिए मिलने वाले राज्य वित्त आयोग (SFC) का पैसा रुकने से हालात बेकाबू हो चुके हैं। बड़ी ग्राम पंचायतों में स्थिति यह है कि प्रतिमाह 20 हजार से 30 हजार रुपए तक का बिजली बिल बकाया चल रहा है। विद्युत विभाग की ओर से बार-बार कनेक्शन काटने की चेतावनियां मिल रही हैं। यदि अगले कुछ दिनों में भुगतान नहीं हुआ, तो पंचायत मुख्यालय अंधेरे में डूब जाएंगे, जिससे ऑनलाइन प्रमाण पत्र, जन्म-मृत्यु पंजीकरण और अन्य डिजिटल कार्य पूरी तरह ठप हो जाएंगे।
संकट सिर्फ बिजली तक सीमित नहीं है;
गांवों में सफाई व्यवस्था संभालने वाले सफाई कर्मी, संविदा कर्मचारी और सरकार द्वारा लगाए जा रहे विभिन्न कैंपों में सेवा देने वाले कर्मचारी पिछले कई महीनों से अपने मानदेय के लिए तरस रहे हैं। बजट के अभाव में न तो गांवों में नई सीसी रोड बन पा रही है और न ही पुराने कार्यों की मरम्मत हो रही है। ठेकेदार और सप्लायर अपने बकाया भुगतान के लिए रोजाना सरपंचों के घर के चक्कर काट रहे हैं।
सरपंचों की साख दांव पर: “हम जनता को क्या मुंह दिखाएं?”
सरपंचों के लिए यह स्थिति किसी दुःस्वप्न से कम नहीं है। पंचायतों में बजट शून्य होने के कारण ग्रामीण अब सरपंचों की ईमानदारी पर सवाल उठा रहे हैं। कई गांवों में सरपंचों पर ‘भ्रष्टाचार और बजट की बंदरबांट’ के झूठे आरोप लगाए जा रहे हैं, जबकि हकीकत में सरकारी खजाना ही खाली है। सरपंचों का कहना है कि आगामी चुनाव में उन्हें इस प्रशासनिक विफलता का भारी खामियाजा भुगतना पड़ेगा।
इस मुद्दे पर डूंगरपुर जिला ग्राम विकास अधिकारी संघ के अध्यक्ष राहुल रोत का कहना है कि, “हमने मीटिंग में इस पीड़ा को उठाया है। जमीनी स्तर पर मुश्किलें बढ़ गई हैं, लेकिन पैसा अभी तक क्यों नहीं आया, इसका जवाब जयपुर के उच्च अधिकारी ही दे सकते हैं।” वहीं, प्रतापगढ़ के अध्यक्ष रविंद्र सिंह राव ने कहा कि, “हमें जानकारी मिली है कि बांसवाड़ा, उदयपुर और अलवर जैसे जिलों में किस्तें जारी हो चुकी हैं। फिर प्रतापगढ़ के साथ क्यों नहीं मिली यह पता नहीं ?” इसी सुर में राजसमंद के अध्यक्ष अर्जुन सिंह राठौड़ ने बताया कि पंचायतों की व्यवस्था उधारी के सहारे चल रही है और उच्च स्तर पर बात पहुंचाई है।
होली की खुशियां या मंदी की मार?
अगले महीने मार्च में होली का बड़ा त्यौहार है। गांवों में जहां खुशियों का माहौल होना चाहिए था, वहां मजदूर अपनी पिछली मजदूरी के लिए भटक रहे हैं। यदि राज्य सरकार ने तुरंत ग्रांट जारी नहीं की, तो इन तीन जिलों में पंचायती राज का ढांचा पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगा। त्यौहार के समय मजदूरों के घरों में छाई यह ‘आर्थिक मंदी’ न केवल सरकार के खिलाफ जन-आक्रोश पैदा करेगी, बल्कि आम जनता का लोकतांत्रिक व्यवस्था से भरोसा भी उठा देगी।
प्रभावित जिले: डूंगरपुर, राजसमंद और प्रतापगढ़।
कुल प्रभावित पंचायतें: 740 ग्राम पंचायतें।
बकाया बजट: प्रति पंचायत औसतन 30-35 लाख रुपए सालाना।
प्रमुख संकट: बिजली बिलों का अंबार, सफाई व्यवस्था ठप, संविदा कर्मियों और मजदूरों का बकाया मानदेय।
उधारी की पंचायत: बिजली कटने का अल्टीमेटम, मानदेय का अकाल
