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भगवान भरोसे मांजी साहिबा की सराय, इतिहास के धरोहर भवन की दुर्दशा

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भगवान भरोसे मांजी साहिबा की सराय, इतिहास के धरोहर भवन की दुर्दशा

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राणा प्रतापनगर स्टेशन के सामने 1931 में बनी सराय, रखरखाव के अभाव में उपेक्षित
उदयपुर, 24 अक्टूबर (राजेश वर्मा):
शहर के राणा प्रतापनगर रेलवे स्टेशन के सामने स्थित देवस्थान विभाग की प्राचीन मांजी साहिबा की सराय आज अपनी पहचान और उद्देश्य दोनों खो चुकी है। 1931 में तत्कालीन महाराणा द्वारा यात्रियों की सुविधा के लिए बनवाई गई यह सराय अब पूरी तरह भगवान भरोसे है।
विभाग के पास न तो रखरखाव के लिए पर्याप्त बजट है, न ही स्टाफ। 33 कमरों वाली इस सराय में आज मुश्किल से कुछ ही कमरे उपयोग में हैं। एक कमरा नगर निगम का सेक्टर कार्यालय है, जबकि दूसरा व्यवस्थापक के नाम से है, पर वहां कोई व्यवस्थापक नहीं मिलता। सराय में केवल एक पुराना रजिस्टर रखा है जिसमें कभी-कभार ठहरने वालों की एंट्री होती है। भूतल के दो कमरों में डाक विभाग का पोस्ट ऑफिस अवश्य संचालित है।
फेरीवाले और नशाखोरों का ठिकाना बनी सराय
मांजी साहिबा की सराय के शेष हिस्से में फेरी लगाने वाले लोग अस्थायी ठिकाने के रूप में रहते हैं। देवस्थान विभाग की सुविधाओं के अभाव में अब यहां आम यात्री नहीं ठहरते। दिन में कुछ लोग अपने वाहन सराय के आंगन में खड़े कर देते हैं, जिससे यह अवैध पार्किंग स्थल बन चुका है। शाम ढलते ही यह परिसर समाजकंटकों और नशा करने वालों की पनाहगाह बन जाता है। सराय की छत पर शराब की खाली बोतलें और कचरा बिखरा दिखना आम बात है।
सफाई और सुरक्षा दोनों लचर, कर्मचारी नदारद
नियमित सफाई नहीं होने से परिसर में गंदगी फैली रहती है। शौचालयों की हालत भी जर्जर है। विभाग में वर्षों से नए कर्मचारी नहीं लगाए जाने के कारण कई पद रिक्त हैं। वर्तमान में एक सेवानिवृत्त कर्मचारी को देखरेख का जिम्मा सौंपा गया है, लेकिन वह भी मौके पर कम ही मिलता है।
विभाग ने भेजा प्रस्ताव, रखरखाव की आस
देवस्थान विभाग के अधिकारी देवकृष्ण ने बताया कि सराय की मरम्मत और रखरखाव के लिए प्रस्ताव सरकार को भेजा गया है। फिलहाल बजट स्वीकृति का इंतजार है।
विरासत की दुर्दशा
1931 में जब उदयपुर में पहली बार ट्रेन पहुंची, तब राणा प्रतापनगर स्टेशन के बाहर यात्रियों की रात में ठहरने की सुविधा के लिए यह सराय बनवाई गई थी। तब राणा प्रतापनगर से सूरजपोल के बीच जंगल हुआ करता था और रात में जंगली जानवरों का डर था। यह भवन उदयपुर के यातायात और व्यापारिक इतिहास का गवाह रहा है। मगर अब यह ऐतिहासिक धरोहर प्रशासनिक उपेक्षा और संसाधनों के अभाव में अपनी पहचान खोने के कगार पर है।

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