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हिंदी को राजभाषा बनाने में उदयपुर के मेहता जी का बड़ा योगदान

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हिंदी को राजभाषा बनाने में उदयपुर के मेहता जी का बड़ा योगदान

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संविधान सभा में सांसदों को मनाकर हिंदी के पक्ष में कराया था मतदान, सरदार पटेल के विश्वस्त रहे

उदयपुर, 14 सितंबर (सुभाष शर्मा): हिंदी दिवस हर साल पूरे देश और विदेशों में उत्साह के साथ मनाया जाता है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिलाने में उदयपुर के स्वतंत्रता सेनानी मास्टर बलवंत सिंह मेहता का अहम योगदान रहा। पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू चाहते थे कि हिंदी मिश्रित उर्दू को राजभाषा का दर्जा मिले, लेकिन सरदार वल्लभभाई पटेल और मेहता जी के प्रयासों से हिंदी को मान्यता मिल पाई।
नेहरू उर्दू मिश्रित हिंदी के समर्थक, पटेल चाहते थे शुद्ध हिंदी
मास्टर मेहता संविधान निर्माता समिति में राजस्थान से सदस्य थे। अपनी जीवनी में उन्होंने लिखा कि नेहरू हिंदी मिश्रित उर्दू के कट्टर समर्थक थे और इसे ही राजभाषा बनाना चाहते थे। इस पर तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल ने हस्तक्षेप किया और हिंदी के पक्ष में माहौल बनाने का जिम्मा माताजी को सौंपा। सरदार पटेल की प्रेरणा पर मास्टर मेहता ने सांसदों के घर-घर जाकर उन्हें हिंदी के पक्ष में वोट देने के लिए राजी किया। नतीजतन संविधान सभा में मतदान के दौरान हिंदी को राजभाषा घोषित किया गया।
मेहता का जीवन और योगदान
मास्टर बलवंत सिंह मेहता का जन्म 8 फरवरी 1900 को उदयपुर में हुआ। वर्ष 1915 में वे राजनीतिक गतिविधियों से जुड़े और प्रताप सभा का संचालन किया। 1938 में प्रजामंडल के प्रथम अध्यक्ष बने और भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रहे। आजादी के बाद वे संविधान निर्माता सभा के सदस्य भी बने। उनके प्रयासों से 1970 में माउंट आबू राजस्थान में शामिल हुआ। मेहताजी ने वनवासी छात्रावास की स्थापना की और पिछड़े वर्गों के उत्थान में जीवन समर्पित किया। गांधीवादी जीवन शैली के समर्थक रहे मेहताजी ने कई पुस्तकें लिखीं, जिनमें लाइफ ऑफ मीराबाई एंड उनके गाने, महाराणा प्रताप, चित्तौड़गढ़ का किला, मेवाड़ दिग्दर्शन और राजपुताना शामिल हैं। 31 जनवरी 2003 को 103 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिलाने में उनकी भूमिका आज भी अविस्मरणीय है।

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