मशरूम खेती से बदलेगी आदिवासी किसानों की तक़दीर
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अरावली की पहाड़ियों में बसे परिवारों को मिला आजीविका का नया विकल्प
राजेश वर्मा
उदयपुर, 5 जनवरी: उदयपुर के जनजाति बाहुल अंचलों में आदिवासी किसानों की आजीविका को नया संबल देने के रूप में मशरूम की खेती उभरकर सामने आई है। छोटी–छोटी जोत और पारंपरिक खेती पर निर्भर आदिवासी परिवारों में अब मशरूम उत्पादन को लेकर उत्साह बढ़ रहा है। अरावली पहाड़ियों की तलहटी में अनुकूल जलवायु और नमी के चलते यह खेती उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने की उम्मीद जगा रही है।
पहाड़ी क्षेत्रों में मिला उपयुक्त विकल्प
झाड़ोल, फलासिया, कोटड़ा, ओगणा, पानरवा, सायरा, गोगुंदा सहित उदयपुर व सलूम्बर जिले के कई आदिवासी क्षेत्रों में किसान अब मक्का, हल्दी, अदरक जैसी पारंपरिक फसलों के साथ मशरूम उगा रहे हैं। पहाड़ियों से बहने वाले छोटे–छोटे धोरों से बनी नमी ने ढींगरी, बटन और दूधछाता मशरूम की वैज्ञानिक खेती को संभव बनाया है।

प्रशिक्षण से बदली तस्वीर
महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर में संचालित अखिल भारतीय समन्वित मशरूम अनुसंधान परियोजना के तहत अनुसूचित जाति उपयोजना (एसीएसपी) के माध्यम से आदिवासी किसानों को प्रशिक्षण दिया गया। कृषि पर्यवेक्षकों के मार्गदर्शन में किए गए इन प्रयासों के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। आदिवासी महिलाएं भी बड़ी संख्या में इस कार्य से जुड़ रही हैं।

आय का नया स्रोत बना मशरूम
परियोजना प्रभारी प्रो. नारायणलाल मीणा के अनुसार मशरूम की बिक्री से किसानों को अच्छा लाभ मिल रहा है। कृषि विभाग 200 रुपए प्रति किलो की दर से मशरूम खरीदता है, जबकि खुले बाजार में इसकी कीमत लगभग 250 रुपए प्रति किलो तक मिल जाती है। होटल और प्रवासी समुदायों में भी इसकी अच्छी मांग है।

पोषण और औषधीय गुणों से भरपूर
मशरूम पोषण से भरपूर होने के साथ कई औषधीय गुणों वाला खाद्य पदार्थ है। यह मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग और कैंसर प्रतिरोधक गुणों के लिए जाना जाता है।
उम्मीद की नई किरण
मशरूम की खेती से जुड़े सकारात्मक अनुभवों ने अन्य आदिवासी किसानों को भी प्रेरित किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रशिक्षण और बाजार की व्यवस्था मजबूत की जाए, तो यह खेती अरावली क्षेत्र के आदिवासी परिवारों की आर्थिक स्थिति में स्थायी सुधार ला सकती है।
