अब सिर्फ आश्वासन नहीं, ठोस निर्णय चाहिए
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-हाईकोर्ट बेंच को लेकर गरजे अधिवक्ता
-चार दशक पुरानी मांग को लेकर अधिवक्ताओं का कोर्ट परिसर के बाहर धरना, नेताओं पर उठे सवाल
उदयपुर, 7 जनवरी: उदयपुर में हाईकोर्ट बेंच की स्थापना की वर्षों पुरानी मांग को लेकर बुधवार को बार एसोसिएशन उदयपुर एवं जिला हाईकोर्ट बेंच संघर्ष समिति के तत्वावधान में जिला न्यायालय परिसर के बाहर जोरदार धरना-प्रदर्शन किया गया। बड़ी संख्या में अधिवक्ताओं ने न्यायिक अधिकारों के समर्थन में एकजुट होकर नारेबाजी की और सरकार से शीघ्र निर्णय लेने की मांग की। धरने को संबोधित करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता शंभू सिंह राठौड़ ने कहा कि यदि इस बार भी उदयपुर को हाईकोर्ट बेंच नहीं मिलती है तो यह जनप्रतिनिधियों और संबंधित नेतृत्व की गंभीर विफलता मानी जाएगी। उन्होंने कहा कि मेवाड़-वागड़ अंचल की भौगोलिक, सामाजिक और न्यायिक जरूरतों को देखते हुए यहां हाईकोर्ट बेंच अत्यंत आवश्यक है।
पूर्व विधानसभा अध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता शांतिलाल चपलोत ने कहा कि पिछले कई दशकों में नेताओं से केवल आश्वासन ही मिले हैं, लेकिन ठोस परिणाम सामने नहीं आए। उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण यह महत्वपूर्ण मांग अब तक अधूरी है। चपलोत ने कहा कि उदयपुर जैसे संभागीय मुख्यालय में बेंच नहीं होना दुर्भाग्यपूर्ण है, जिससे आम जनता और वकीलों को जयपुर तक लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। उल्लेखनीय है कि उदयपुर में हाईकोर्ट बेंच की मांग वर्ष 1982 से लगातार उठाई जा रही है। वर्ष 1990 में भी बड़ा आंदोलन हुआ था और तब से प्रत्येक माह की 7 तारीख को प्रतीकात्मक धरना दिया जाता रहा है। समय-समय पर विशाल प्रदर्शन, ज्ञापन और प्रतिनिधिमंडल भी भेजे गए, लेकिन अब तक मांग पूरी नहीं हुई। धरने में पूर्व बार अध्यक्ष रामकृपा शर्मा, भरत वैष्णव, भरत जोशी, राकेश मोगरा, पूर्व महासचिव भूपेंद्र, पूर्व उपाध्यक्ष बंशीलाल गवारिया, पूर्व महासचिव चेतनपुरी गोस्वामी, पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष और एडवोकेट अमित पालीवाल आदि शामिल हुए। सभी ने एक स्वर में आंदोलन को और तेज करने का संकल्प लिया तथा कहा कि जब तक उदयपुर को हाईकोर्ट बेंच नहीं मिलेगी, तब तक यह संघर्ष जारी रहेगा।
हाईकोट आंदोलन : एक नजर
उदयपुर में राजस्थान हाईकोर्ट की स्थायी बेंच स्थापना की मांग 44 वर्षों से लगातार जारी है। इस संघर्ष के तहत उदयपुर के अधिवक्ता हर महीने की सात तारीख को न्यायिक कार्यों का बहिष्कार करते हैं। हाल ही में राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को उदयपुर में बेंच स्थापना की अनुशंसा भेजी थी, लेकिन इसे खारिज कर दिया गया। इससे यह मांग अब भी लंबित है और वकीलों का आंदोलन जारी है।
इस आंदोलन का इतिहास बेहद सक्रिय और उग्र रहा है। 1998 में बार अध्यक्ष जे.के. दवे के नेतृत्व में डेढ़ महीने तक आंदोलन चला, जिसमें न्यायिक बहिष्कार, उदयपुर बंद और लाठीचार्ज जैसी घटनाएं हुईं। 1995 में तत्कालीन शिक्षा मंत्री गुलाबचंद कटारिया के चेहरे पर कालिख पोते जाने की घटना ने पूरे प्रदेश में सनसनी फैला दी। करीब आठ साल पहले पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता शांतिलाल चपलोत ने आमरण अनशन किया था, जिसे सरकार के आश्वासन पर समाप्त कराया गया।
बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों का कहना है कि चीफ जस्टिस ने बिना किसी विस्तृत रिपोर्ट के अनुशंसा खारिज की। उनका मानना है कि इससे वकीलों का मनोबल कमजोर नहीं हुआ, बल्कि आंदोलन को और धार मिली है। आगामी दिनों में कैंडल मार्च, नुक्कड़ नाटक और मानव श्रृंखला जैसे आंदोलनात्मक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
हाईकोर्ट बेंच की मांग कई लोकसभा चुनावों में उभर चुकी है। इंदिरा गांधी से लेकर नरेंद्र मोदी तक के कार्यकाल में यह मुद्दा उठाया गया। उदयपुर संभाग जनजाति बाहुल्य और आर्थिक रूप से कमजोर क्षेत्र है, जहां न्याय पाना जयपुर या जोधपुर जाकर कठिन है। मेवाड़ स्टेट के विलय के समय उदयपुर में हाईकोर्ट बेंच का अस्तित्व रहा, जिससे अधिवक्ताओं का दावा और मजबूत होता है।
