‘गोरा-बादल’ कविता के रचनाकार पं. नरेंद्र मिश्र का निधन, साहित्य जगत में शोक
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चित्तौड़गढ़, 9 दिसंबर: राष्ट्रीय स्तर के वीर रस के कवि और ‘गोरा-बादल’ के रचनाकार पंडित नरेंद्र मिश्र का मंगलवार को निधन हो गया। वे 88 वर्ष के थे और पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे। मंगलवार सुबह नाश्ते के बाद उनकी तबीयत अचानक बिगड़ी और उन्हें निजी हॉस्पिटल ले जाने पर डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया।
साहित्यिक जीवन और योगदान:
पंडित मिश्र ने 10वीं कक्षा में ही कालजयी कविता ‘गोरा-बादल’ लिखी। मेवाड़ के इतिहास और संस्कृति के प्रति उनके गहरे प्रेम ने उन्हें अपनी कर्मभूमि राजस्थान बनाना प्रेरित किया। उन्होंने चित्तौड़गढ़ में शिक्षक के रूप में करियर की शुरुआत की और उपजिला शिक्षा अधिकारी पद से रिटायर हुए। उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘हल्दीघाटी’, ‘पद्मिनी’, ‘हुमायूं की राखी’, ‘जौहर की ज्वाला अविनाशी’, ‘पन्नाधाय’, ‘हाड़ी रानी’ और महाराणा प्रताप पर कविताएं शामिल हैं। कई पंक्तियां चित्तौड़गढ़, उदयपुर और दिल्ली के सार्वजनिक स्थलों पर अंकित हैं।
अंतिम रचना और सम्मान:
दो दिन पहले ही पंडित मिश्र ने वंदेमातरम पर चार पंक्तियां लिखीं—“आस्था की अस्मिता की शान वंदेमातरम… जो तिरंगे के लिए सिर पर कफन बांधे रहे… उन अमर शहीदों का बलिदान वंदेमातरम…”। उन्होंने मंचीय कविता में भी 18 बार लाल किले से राजस्थान का प्रतिनिधित्व किया। उन्हें महाराणा कुम्भा सम्मान, निराला सम्मान, तांत्या टोपे सम्मान, दीन दयाल उपाध्याय साहित्य पुरस्कार सहित कई प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुए।
उनका निधन साहित्य और शिक्षा जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। उनका वीर रस और मेवाड़ की गौरव गाथाओं को उजागर करने वाला साहित्य आज भी नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।
