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राजसमंद झील और ‘नौ चौकी पाल’ में हैं यूनेस्को की मिश्रित विश्व धरोहर बनने के सभी गुण

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राजसमंद झील और ‘नौ चौकी पाल’ में हैं यूनेस्को की मिश्रित विश्व धरोहर बनने के सभी गुण

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संस्कृति–प्रकृति के दुर्लभ संगम, विश्व के सबसे बड़े शिलालेख और ऐतिहासिक जल-संरक्षण प्रणाली का अद्भुत उदाहरण
उदयपुर, 13 दिसम्बर (विजन 360 न्यूज डेस्क):
मेवाड़ की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक पहचान राजसमंद झील तथा इससे जुड़ी भव्य संरचना ‘नौ चौकी पाल’ में यूनेस्को की ‘मिश्रित विश्व धरोहर’ (Mixed World Heritage) सूची में शामिल होने के सभी आवश्यक गुण विद्यमान हैं। विरासत विशेषज्ञों और संरक्षण से जुड़े संगठनों का मानना है कि यह स्थल संस्कृति और प्रकृति के ऐसे दुर्लभ संगम का प्रतिनिधित्व करता है, जो यूनेस्को के निर्धारित मानकों पर पूरी तरह खरा उतरता है। यदि इसे यह दर्जा मिलता है, तो यह न केवल राजस्थान बल्कि पूरे भारत के लिए गौरव का विषय होगा।
यूनेस्को के दिशा-निर्देशों के अनुसार, जिन स्थलों में सांस्कृतिक विरासत और प्राकृतिक संपदा का समान व विशिष्ट महत्व होता है, उन्हें ‘मिश्रित धरोहर’ की श्रेणी में रखा जाता है। भारत में वर्तमान में इस श्रेणी में केवल एक ही स्थल सिक्किम का कंचनजंघा शामिल है। ऐसे में राजसमंद झील और नौ चौकी पाल का इस सूची में नाम जुड़ना राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
संस्कृति और प्रकृति का अनुपम संगम
राजसमंद झील अपने विशाल जल क्षेत्र, ऐतिहासिक जल-प्रबंधन प्रणाली और समृद्ध जैव-विविधता के लिए प्रसिद्ध है। इसके तट पर स्थित नौ चौकी पाल मेवाड़ की स्थापत्य परंपरा, कलात्मक सौंदर्य और ऐतिहासिक चेतना का सजीव प्रतीक है। प्राकृतिक सौंदर्य और मानव-निर्मित धरोहर का यह सामंजस्य इसे ‘मिश्रित विश्व धरोहर’ की श्रेणी में विशेष स्थान दिलाने योग्य बनाता है।
अद्वितीय स्थापत्य और ऐतिहासिक महत्व
मेवाड़ के महाराणा राजसिंह द्वारा निर्मित नौ चौकी पाल भारतीय स्थापत्य कला का बेजोड़ उदाहरण है। इतिहासकारों के अनुसार इसकी भव्यता से मुगल शासक औरंगज़ेब भी प्रभावित हुआ था और उसने इसे न तोड़ने का आदेश दिया था। यह तथ्य इस धरोहर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को और अधिक सशक्त बनाता है।
राज-प्रशस्ति: विश्व का सबसे बड़ा शिलालेख
नौ चौकी पाल पर उत्कीर्ण राज-प्रशस्ति को विश्व का सबसे बड़ा शिलालेख माना जाता है। रणछोड़ भट्ट तैलंग द्वारा रचित 1106 श्लोकों वाला यह अभिलेख 25 विशाल शिलाओं पर अंकित है। यह केवल वंशावली नहीं, बल्कि 17वीं शताब्दी का एक महत्वपूर्ण सामाजिक दस्तावेज़ है, जिसमें जल-संरक्षण, बांध निर्माण तकनीक, श्रम व्यवस्था, खानपान, वेशभूषा और पर्यावरण का विस्तृत विवरण मिलता है।
संरक्षण की तत्काल आवश्यकता
इतनी समृद्ध विरासत आज संरक्षण की कमी से जूझ रही है। शिलालेखों की सुरक्षा जालियां क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं, एक शिलालेख लापता बताया जा रहा है और कई अभिलेख पढ़ने योग्य नहीं रहे। विशेषज्ञों का कहना है कि समय रहते संरक्षणात्मक कदम नहीं उठाए गए तो यह धरोहर अपूरणीय क्षति का शिकार हो सकती है।
यूनेस्को मान्यता से होंगे बहुआयामी लाभ
यूनेस्को की मान्यता मिलने से राजसमंद झील और नौ चौकी पाल को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलेगी, पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, स्थानीय रोजगार के अवसर सृजित होंगे और सबसे महत्वपूर्ण—इस धरोहर के संरक्षण को वैश्विक समर्थन प्राप्त होगा।
विरासत संरक्षण की दिशा में पहल
इंटैक (INTACH) उदयपुर के बिल्ट हेरिटेज एवं जल संसाधन विभाग के समन्वयक प्रो. महेश शर्मा लंबे समय से इस धरोहर को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने के लिए सक्रिय हैं। उन्होंने राज्य व केंद्र सरकार के माध्यम से यूनेस्को को प्रस्ताव भेजने, शिलालेखों की सुरक्षा हेतु टफन्ड ग्लास लगाने, बेहतर प्रकाश व्यवस्था करने तथा लापता शिलालेख की खोज और जीर्णोद्धार की मांग उठाई है। उन्होंने जिला कलेक्टर को भी प्रस्ताव भेजने का सुझाव दिया, जिसे कलेक्टर अरुण कुमार हसीजा ने गंभीरता से लिया है।

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