सोना-चांदी की रिकॉर्ड महंगाई ने बिगाड़ा शादी का गणित
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ब्याह-शादी वाले घरों में नई खरीद की जगह पुराने गहनों के उपयोग को प्राथमिकता
उदयपुर, 19 जनवरी : आगामी ब्याह-शादी के सीजन से पहले सोना और चांदी की बेतहाशा बढ़ती कीमतों ने आम परिवारों का बजट बिगाड़ कर रख दिया है। बीते एक वर्ष में जहां सोने के भाव में करीब 75 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, वहीं चांदी लगभग 300 प्रतिशत तक उछल चुकी है। इस तेजी का सीधा असर उन परिवारों पर पड़ा है, जिनके घरों में बेटा या बेटी की शादी तय है। हालात यह हैं कि अब लोग बाजार से नया सोना-चांदी खरीदने के बजाय घर में पहले से मौजूद गहनों और चांदी के बर्तनों का उपयोग करने को प्राथमिकता दे रहे हैं।
पिछले वर्ष जनवरी के अंत में सोना जहां 74 हजार रुपए प्रति दस ग्राम था, वह अब बढ़कर 1 लाख 46 हजार 640 रुपए प्रति दस ग्राम तक पहुंच गया है। इसी तरह चांदी 91 हजार 450 रुपए प्रति किलोग्राम से बढ़कर 3 लाख 18 हजार रुपए प्रति किलोग्राम हो गई है। सर्राफा बाजार से जुड़े व्यापारियों का कहना है कि इतनी तेज महंगाई पहले कभी नहीं देखी गई, जिससे शादी-विवाह की खरीदारी पर ब्रेक लग गया है।
उदयपुर के सर्राफा व्यापारियों के अनुसार शादी वाले परिवार अब हल्के वजन के आभूषण बनवा रहे हैं या फिर पुराने गहनों को पॉलिश और रिमॉडल करवा रहे हैं। कई परिवार पारंपरिक रूप से संग्रहित सोने-चांदी को ही काम में ले रहे हैं, ताकि बढ़ते दामों से बजट पर अतिरिक्त बोझ न पड़े। चांदी के मामले में भी लोग नए बर्तन या आभूषण खरीदने से बचते नजर आ रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव, डॉलर की स्थिति और शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव के कारण सोना सुरक्षित निवेश बना हुआ है, जबकि सोलर पैनल और इलेक्ट्रॉनिक उद्योग में बढ़ती मांग ने चांदी की कीमतों को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है। ऐसे में आने वाले महीनों में भी कीमतों में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है।
कुल मिलाकर सोना-चांदी की रिकॉर्ड महंगाई ने इस शादी के सीजन में खुशियों के साथ-साथ बजट की चिंता भी बढ़ा दी है और लोग अब खरीदारी में पहले से कहीं अधिक सोच-समझकर कदम उठा रहे हैं।
बहू को वरपक्ष भी भेंट करता है जेवर
हिन्दू विवाह परम्परा में बेटी को गहने देने का ही नहीं, बल्कि बहू को भी वरपक्ष की ओर से जेवर प्रदान करने का रिवाज है। इस परम्परा को ‘पड़ला’ कहते हैं। विवाह से ठीक पहले वरपक्ष के बड़े-बुजुर्ग वधुपक्ष को बहू के लिए जेवर देने जाते हैं। ऐसे में चाहे बेटी विदा हो रही हो, या बहू को ला रहे हों, जेवर का खर्च दोनों पक्षों में लगभग बराबर का रहता है। हाल की स्थितियों में कई परिवारों के दोनों ही पक्ष इस मामले में समझदारी दिखाते हुए आपस में बातचीत कर रहे हैं।
