8वीं से 9वीं में आते ही अभिभावकों पर भारी पड़ेगी आरटीई की फीस
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आठवीं के बच्चों के अभिभावकों को अभी से दी जा रही अगले सत्र की पूरी फीस भरने की सूचना
कौशल मूंदड़ा
उदयपुर, 1 नवम्बर: आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून, जिसके तहत बच्चे आठवीं कक्षा तक निशुल्क शिक्षा प्राप्त करते हैं, अब नौवीं कक्षा में प्रवेश करते ही एक बड़ा बोझ बनने जा रहा है। नौवीं में आते ही निजी स्कूलों की फीस का भार सीधा अभिभावकों पर पड़ेगा, जिससे यह ‘सहारा’ अब ‘बोझ’ में बदलता दिख रहा है।
अभिभावकों पर दबाव अभी से
निजी स्कूलों ने आठवीं कक्षा में पढ़ रहे बच्चों के अभिभावकों को अभी से यह बताना शुरू कर दिया है कि यदि वे अपने बच्चों को स्कूल में नियमित (Regular) रखना चाहते हैं, तो उन्हें अगले सत्र से पूरी फीस जमा कराने की तैयारी रखनी होगी या कोई अन्य व्यवस्था तलाशनी होगी। यह दबाव तब बनाया जा रहा है जब आठवीं की वार्षिक परीक्षा में अभी कई महीने बाकी हैं।
भारी पड़ रहा फीस पुनर्भरण का फार्मूला
नौवीं या उससे आगामी कक्षाओं में RTE के तहत पढ़ने वाले बच्चों की फीस जमा कराने का प्रावधान इस समस्या की जड़ है।
भुगतान का तरीका बदला: आठवीं तक बच्चों की फीस सीधे स्कूल के खाते में जमा होती थी, लेकिन नौवीं से यह पुनर्भरण सीधे अभिभावक के खाते में किया जाता है।
अंतर बहुत बड़ा: अभिभावक को एक बार में निजी स्कूल की पूरी फीस स्वयं अपनी जेब से भरनी होगी। इसके बाद सरकार द्वारा निर्धारित पुनर्भरण राशि सीधे अभिभावक के खाते में जाएगी।
नाममात्र का पुनर्भरण: सरकार का पुनर्भरण फार्मूला आठवीं कक्षा में दी गई राशि से 9वीं में 10% और 11वीं में फिर से 10% बढ़ाकर लागू होता है। यह राशि स्कूल की कुल फीस की एक तिहाई से भी कम बैठती है।
उदाहरण: यदि किसी स्कूल में 9वीं की फीस लगभग 45 से 50 हजार रुपये है, तो अभिभावक के खाते में सरकार मात्र 14 से 15 हजार रुपये ही भेजेगी।
स्कूलों की मांग:
निजी स्कूलों का कहना है कि 9वीं से 12वीं तक फीस पुनर्भरण का यह फार्मूला आर्थिक रूप से अक्षम अभिभावकों पर भारी पड़ रहा है। वे सरकार से मांग कर रहे हैं कि 9वीं से 12वीं कक्षा में भी पूरी फीस पुनर्भरण का प्रावधान उसी तरह किया जाए, जिस तरह आठवीं तक के बच्चों के लिए किया जाता है।
