सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रूख: डिजिटल अरेस्ट कोई आम अपराध नहीं, न्याय व्यवस्था पर हमला
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नई दिल्ली, 17 अक्टूबर (विजन 360 न्यूज डेस्क): देश में डिजिटल अरेस्ट और ऑनलाइन ठगी की घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता व्यक्त की है। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने कहा कि यह कोई साधारण अपराध नहीं है। कोर्ट और जांच एजेंसियों के नकली आदेश, मुहर और जजों के साइन बनाकर लोगों को ठगना पूरी न्याय व्यवस्था पर सीधा हमला है।
यह मामला हरियाणा के अंबाला जिले का है, जहां 73 वर्षीय बुजुर्ग दंपति को 3 से 16 सितंबर के बीच ठगों ने डिजिटल अरेस्ट कर 1.05 करोड़ रुपए ठग लिए। ठगों ने खुद को CBI और ED अधिकारी बताया तथा फर्जी कोर्ट ऑर्डर दिखाकर दंपती को अलग-अलग बैंक खातों में पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया। महिला ने 21 सितंबर को चीफ जस्टिस बीआर गवई को चिट्ठी लिखी, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने खुद इस मामले में कदम उठाया।
कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल की मदद लेते हुए केंद्र, हरियाणा सरकार और अंबाला साइबर क्राइम यूनिट को निर्देश दिया कि अब तक की जांच रिपोर्ट पेश की जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार के अपराधों का राष्ट्रीय स्तर पर फैलता नेटवर्क सामने आया है, इसलिए केंद्र और राज्य पुलिस को मिलकर कार्रवाई करनी होगी।
दिल्ली पुलिस के आंकड़ों के अनुसार, 2025 में राजधानी में साइबर ठगी के जरिए लगभग 1,000 करोड़ रुपए ठगे गए। इसमें डिजिटल अरेस्ट, इन्वेस्टमेंट स्कैम और बॉस स्कैम प्रमुख तरीके रहे। साइबर अपराधी वीडियो कॉलिंग के दौरान धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलते हैं, आईडी कार्ड दिखाते हैं और बैकग्राउंड में किसी एजेंसी का लोगो रखते हैं।
साइबर जांच अधिकारियों का कहना है कि पढ़े-लिखे, उच्च पदस्थ और रिटायर्ड लोग इन ठगों को असली अफसर मान लेते हैं। 2024 में दिल्ली में साइबर ठगी से 1,100 करोड़ रुपए की हानि हुई थी, जिसमें केवल 10% राशि फ्रीज हो पाई। 2025 में दिल्ली पुलिस और बैंकों के सहयोग से लगभग 20% ठगी रोकने में सफलता मिली, जो पिछले साल की तुलना में दोगुनी उपलब्धि है।
