5 करोड़ लोगों और 20 से अधिक अभयारण्यों की जीवन-रेखा है अरावली
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पर्यावरणविदों का कहना, उत्तर भारत की ‘ग्रीन वॉल’ कमजोर हुई तो जल, हवा और वन्यजीवों पर पड़ेगा गहरा असर
सुभाष शर्मा
उदयपुर, 24 दिसम्बर: उत्तर भारत की पर्यावरणीय सुरक्षा की सबसे मजबूत ढाल मानी जाने वाली अरावली पर्वतमाला आज गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। करीब 800 किलोमीटर लंबी यह विश्व की प्राचीनतम पर्वतमालाओं में से एक है, जो राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली-NCR और गुजरात तक फैली हुई है। विशेषज्ञों के अनुसार अरावली केवल पहाड़ों की श्रृंखला नहीं, बल्कि करीब पांच करोड़ लोगों के जीवन, जल स्रोतों और 20 से अधिक वन्यजीव अभयारण्यों की जीवन-रेखा है।
पर्यावरणविद चेतावनी दे रहे हैं कि अरावली थार मरुस्थल को पूर्व की ओर फैलने से रोकने वाली प्राकृतिक दीवार है। यदि इसका क्षरण जारी रहा, तो राजस्थान, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का बड़ा हिस्सा रेगिस्तानी हालात की ओर बढ़ सकता है। यही कारण है कि अरावली को उत्तर भारत की “ग्रीन वॉल” कहा जाता है।
जल, हवा और जलवायु संतुलन का आधार
अरावली मानसूनी हवाओं को नियंत्रित कर वर्षा में सहायक होती है और भूजल रिचार्ज की रीढ़ है। इसके कमजोर होने से दिल्ली-NCR में जल संकट, अत्यधिक गर्मी और वायु प्रदूषण कई गुना बढ़ने की आशंका है।
20 से अधिक अभयारण्यों की सांसें अरावली से जुड़ी
अरावली क्षेत्र में सरिस्का टाइगर रिजर्व, कुंभलगढ़, माउंट आबू, सीतामाता, फुलवारी की नाल, टोडगढ़-रावली, सुल्तानपुर राष्ट्रीय उद्यान, भिंडावास, आसोला-भट्टी और जेसोर स्लॉथ बियर अभयारण्य सहित 20 से अधिक संरक्षित वन क्षेत्र स्थित हैं। यहां तेंदुआ, स्लॉथ बियर, नीलगाय और सैकड़ों पक्षी प्रजातियां पाई जाती हैं। अरावली एक प्राकृतिक कार्बन सिंक के रूप में भी जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करती है।
चार राज्यों और दिल्ली-NCR की जीवनधारा
अरावली का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा राजस्थान में फैला है, जिसमें उदयपुर, राजसमंद, सिरोही, पाली, अजमेर, अलवर, जयपुर सहित कई जिले आते हैं। हरियाणा के गुरुग्राम, फरीदाबाद, नूंह, रेवाड़ी, दिल्ली के रिज एरिया और गुजरात के बनासकांठा-साबरकांठा की जल-जंगल-जमीन भी अरावली से जुड़ी है।
राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने की मांग तेज
पर्यावरणविद डॉ. सुभाष राणा, जल संरक्षण विशेषज्ञ राजेंद्र सिंह और सामाजिक कार्यकर्ता कुंवर प्रताप सिंह सहित कई विशेषज्ञों का कहना है कि अरावली केवल भूगोल नहीं, बल्कि भारत की पर्यावरणीय सुरक्षा की रीढ़ है। उनका मानना है कि यदि अब इसे राष्ट्रीय धरोहर घोषित कर सख्त और दीर्घकालिक संरक्षण नीति नहीं बनाई गई, तो इसके दुष्परिणाम आने वाली पीढ़ियों को भारी कीमत चुकाने पर मजबूर करेंगे।
