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प्रदेश में रतनजोत बायोफ्यूल योजना ठप, सात साल में नहीं लगाया एक भी पौधा

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प्रदेश में रतनजोत बायोफ्यूल योजना ठप, सात साल में नहीं लगाया एक भी पौधा

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26 लाख हेक्टेयर भूमि की गई थी चिन्हित
सुभाष शर्मा
उदयपुर, 4 जनवरी:
“डीजल नहीं अब बाड़ी से, डीजल मिलेगा बाड़ी से”—यह नारा दस साल पहले बहुत चर्चित रहा था। रतनजोत (जेट्रोफा) से बायोफ्यूल उत्पादन के लिए राज्य सरकार ने योजना बनाई थी, जिसका उद्देश्य देश को डीजल आयात पर निर्भरता से मुक्त करना और पर्यावरण-अनुकूल ईंधन को बढ़ावा देना था। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। सात साल बीत जाने के बाद भी राजस्थान सहित उदयपुर संभाग के कई जिलों में एक भी व्यावसायिक रतनजोत पौधा नहीं लगाया गया, और योजना केवल कागजों तक सीमित रह गई है।
सरकारी दस्तावेजों के अनुसार राजस्थान के 12 जिलों में लगभग 26.66 लाख हेक्टेयर भूमि रतनजोत के लिए चिन्हित की गई थी। उदयपुर संभाग में सर्वाधिक भूमि चिन्हित की गई थी। उदयपुर जिले में 4.57 लाख हेक्टेयर, राजसमंद में 2.05 लाख हेक्टेयर, चित्तौड़गढ़ में 3.57 लाख हेक्टेयर, डूंगरपुर में 1.88 लाख हेक्टेयर, बांसवाड़ा में 3.03 लाख हेक्टेयर और प्रतापगढ़ में 1.77 लाख हेक्टेयर भूमि चिन्हित की गई थी। अन्य जिलों में भी कोटा, भीलवाड़ा, बारां, बूंदी और झालावाड़ में बड़ी मात्रा में भूमि चिन्हित थी, लेकिन न तो पौधारोपण हुआ और न प्रसंस्करण या बायोडीजल उत्पादन इकाइयां स्थापित की गईं।
डीजल खपत भारी, बायोफ्यूल की संभावना अधूरी
राज्य में प्रतिदिन औसतन 1.5 करोड़ लीटर डीजल खपत होती है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि रतनजोत योजना योजनाबद्ध तरीके से लागू होती, तो राजस्थान में सालाना लगभग 2 अरब लीटर बायोडीजल उत्पादन संभव था। इससे डीजल आयात पर निर्भरता कम होती, ईंधन लागत घटती और प्रदूषण पर भी नियंत्रण होता।
क्यों ठप हुई योजना?
विशेषज्ञों के अनुसार योजना ठप रहने के पीछे कई कारण हैं। जिनमें बायोडीजल के लिए स्पष्ट खरीद नीति और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का अभाव, केंद्र और राज्य सरकार के बीच नीतिगत समन्वय की कमी, निजी निवेशकों की घटती रुचि, कोविड-19 के बाद प्राथमिकताओं में बदलाव, सरकारी फोकस का एथेनॉल ब्लेंडिंग, CBG और एडवांस्ड बायोफ्यूल की ओर स्थानांतरित होना शामिल है। कृषि विशेषज्ञ बताते हैं कि रतनजोत का पौधा तीन वर्ष में परिपक्व हो जाता है और एक पौधा सालाना 5-8 किलो बीज देता है। प्रति हेक्टेयर लगभग 1,000 पौधे लगाए जा सकते हैं। लेकिन बाजार और खरीद की गारंटी न होने से किसान इससे दूरी बनाए हुए हैं।
सरकार का रुख: योजना बंद नहीं, होल्ड पर
कृषि विभाग के अतिरिक्त निदेशक कृषि (विस्तार) एस.एस. शेखावत का कहना है कि यह परियोजना औपचारिक रूप से बंद नहीं की गई है। यदि केंद्र सरकार बायोडीजल की खरीद और मिश्रण नीति स्पष्ट करती है, तो इसे पीपीपी या क्लस्टर आधारित मॉडल में फिर से शुरू किया जा सकता है।

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