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आहड़ सभ्यता के टीले और अवशेष कंटीली झाड़ियों में अटके

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आहड़ सभ्यता के टीले और अवशेष कंटीली झाड़ियों में अटके

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उदयपुर का ऐतिहासिक स्थल जर्जर स्थिति में: शुल्क देने के बावजूद देखने से वंचित है शोधार्थी, विद्यार्थी और देसी-विदेशी पर्यटक
राजेश वर्मा
उदयपुर, 8 अक्टूबर:
शहर के आयड़ क्षेत्र में स्थित 4000 वर्ष से अधिक पुरानी आहड़ सभ्यता के टीले और अवशेष लंबे समय से कंटीली झाड़ियों और जंगल की चपेट में हैं। आयड़ संग्रहालय द्वारा पूर्ण शुल्क वसूलने के बावजूद शोधार्थी, स्कूली विद्यार्थी और देसी-विदेशी पर्यटक इन प्राचीन अवशेषों तक पहुँच नहीं पा रहे हैं।
टीले और संग्रहालय का इतिहास
आयड़ नदी के किनारे कभी बसी यह प्राचीन आबादी लगभग छह हजार साल पहले समूल नष्ट हो गई थी। पुरातत्व विभाग द्वारा कई वर्ष पहले की गई खुदाई में आहड़ सभ्यता के अवशेष मिले और उन्हें संग्रहालय में प्रदर्शन और शोध के लिए रखा गया। टीलों पर की गई खुदाई भी प्रारंभ में शोधार्थियों और पर्यटकों के लिए खुली थी, लेकिन अब ये कंटीली झाड़ियों और वनस्पतियों से ढक गई हैं।
सुरक्षा प्रयास और विभाग की उदासीनता
एक दशक पहले स्थानीय पार्षद जगत नागदा और तत्कालीन सभापति युधिष्ठिर कुमावत के प्रयासों से केंद्रीय पुरातत्व विभाग ने दोनों टीलों के चारों तरफ ऊंची चारदीवारी का निर्माण कराया। बावजूद इसके, विभाग के स्थानीय अधिकारियों ने इनकी सुरक्षा में कोई सक्रिय प्रयास नहीं किए। परिणामस्वरूप, शोधार्थी और पर्यटक केवल संग्रहालय में रखे अवशेष देख सकते हैं, जबकि खुले खुदाई स्थल तक पहुँच वर्जित है। संग्रहालय अधीक्षक कार्यालय का टेलीफोन नंबर भी लंबे समय से निष्क्रिय है।
खुली खुदाई में नजर आते अवशेष
खुले खुदाई स्थल में तांबा निकालने वाली भट्टी, मकानों की दीवारें और बड़ी मिट्टी की ईटें स्पष्ट रूप से देखी जा सकती हैं। संग्रहालय में इनके छोटे संस्करण, मिट्टी के घड़े, ताम्बे के औजार, आभूषण और पत्थर के हथियार प्रदर्शित हैं।
बजट का अभाव
संग्रहालय कर्मचारियों के अनुसार, झाड़ियों को साफ करने के लिए बड़ा बजट आवश्यक है, जो विभाग के पास नहीं है। बजट स्वीकृति न होने के कारण टीलों को जंगल मुक्त कराने का कार्य नहीं हो पा रहा। इस स्थिति से शोध और पर्यटन दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
यह है शुल्क
भारतीय पर्यटक 20 रुपए
भारतीय विद्यार्थी 10 रुपए
विदेशी पर्यटक 100 रुपए
विदेशी विद्यार्थी 50 रुपए

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