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विजयदशमी पर शस्त्र पूजन: मेवाड़ की शौर्य परंपरा का अद्भुत संगम

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विजयदशमी पर शस्त्र पूजन: मेवाड़ की शौर्य परंपरा का अद्भुत संगम

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डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने किया पूर्वजों के अस्त्र-शस्त्रों का विधिवत पूजन

उदयपुर, 2 अक्टूबर: विजया दशमी के अवसर पर गुरुवार को सिटी पैलेस स्थित ‘सलेहखाना’ (शस्त्रागार) में मेवाड़ की वीरता और आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिला। मेवाड़ के पूर्व राजपरिवार के सदस्य एवं महाराणा मेवाड़ चैरिटेबल फाउंडेशन के अध्यक्ष और प्रबंध न्यासी डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने मंत्रोच्चारण के साथ पूर्वजों के ऐतिहासिक अस्त्र-शस्त्रों की पूजा-अर्चना की।
हरितराज सिंह को बताई पूर्वजों की परम्परा और गाथाएं
इस अवसर पर 7 तलवारें, ढाल, भाला, 2 बंदूकें, 2 कटार और धनुष-तीर पूजन स्थल पर विराजित किए गए। फौलादी लोहे से बनी तलवारें मेवाड़ी शिल्पकला का अनुपम उदाहरण हैं। तलवारों के मूठ पर सोने के तार, वर्क, कुंदन, मीनाकारी और रत्नजड़ित कला देखने को मिलती है। ढाल पर स्वर्ण कारीगरी, भाले और कटार पर नक्काशी अद्वितीय है। डॉ. लक्ष्यराज सिंह ने इस अवसर पर अपने सुपुत्र हरितराज सिंह को महाराणा सांगा, वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप और महाराणा राजसिंह सहित प्रतापी पूर्वजों की वीर गाथाओं और परंपराओं से अवगत कराया।
परंपरा और आस्था का मेल
डॉ. लक्ष्यराज सिंह ने बताया कि सूर्यवंशी परंपरा में आश्विन शुक्ल दशमी को शस्त्र पूजन का विशेष महत्व है। नवरात्र के नौ दिनों तक शक्ति पूजन के बाद दशहरे पर महाराणाओं द्वारा शमी वृक्ष और अस्त्र-शस्त्र पूजन की परंपरा रही है। पुराने समय में नगर से बाहर आयोजित मोहल्ला दरबार में महाराणा, मंत्रिमंडल और सेना अस्त्र-शस्त्र धारण कर सम्मिलित होते थे।

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