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नाता प्रथा पर हाईकोर्ट की मुहर से मेवाड़–वागड़ की आदिवासी महिलाओं को मिला वैवाहिक अधिकार

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नाता प्रथा पर हाईकोर्ट की मुहर से मेवाड़–वागड़ की आदिवासी महिलाओं को मिला वैवाहिक अधिकार

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उदयपुर, 21 जनवरी: राजस्थान हाईकोर्ट ने नाता प्रथा को वैवाहिक संबंध के रूप में मान्यता देते हुए मेवाड़–वागड़ अंचल की आदिवासी महिलाओं को बड़ी राहत दी है। इस ऐतिहासिक फैसले से अब नाता प्रथा के तहत जीवनयापन करने वाली महिलाओं को वैध पत्नी के समान अधिकार, पारिवारिक पेंशन, मृतक पति से जुड़े सेवा लाभ और अन्य सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ मिल सकेगा।
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि मेवाड़–वागड़ क्षेत्र में भील, गरासिया, डामोर सहित कई आदिवासी समुदायों में नाता प्रथा सदियों से सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा रही है। ऐसे में केवल पारंपरिक रीति-रिवाजों या कानूनी पंजीकरण के अभाव में महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।
आदिवासी समाज की वास्तविकता को मिला न्यायिक सम्मान
अदालत ने माना कि नाता प्रथा के तहत बने संबंधों को समाज की स्वीकृति प्राप्त होती है और पति–पत्नी के रूप में जीवन बिताया जाता है। यदि यह सिद्ध हो जाए कि संबंध स्थिर, दीर्घकालिक और सामाजिक रूप से मान्य रहा है, तो ऐसी महिला को वैध पत्नी के समान अधिकार दिए जाना न्यायसंगत है। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हर नाता संबंध को स्वतः वैध नहीं माना जाएगा।
महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा मजबूत
मेवाड़–वागड़ के आदिवासी इलाकों में अब तक नाता प्रथा से जुड़ी कई महिलाएं सरकारी योजनाओं और पेंशन जैसे अधिकारों से वंचित थीं। इस फैसले से उन्हें कानूनी सुरक्षा मिलने के साथ-साथ सामाजिक सम्मान भी बढ़ेगा। विशेषज्ञों के अनुसार यह निर्णय आदिवासी महिलाओं के जीवन में आर्थिक स्थिरता और आत्मसम्मान का नया आधार बनेगा।
NHRC की चिंता भी उल्लेखनीय
राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने पहले नाता प्रथा के कुछ मामलों में दुरुपयोग की आशंका जताई है और राज्यों को निगरानी के निर्देश दिए हैं। ऐसे में हाईकोर्ट का यह फैसला संतुलित माना जा रहा है, जो परंपरा का सम्मान करते हुए महिलाओं के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करता है।
क्या है नाता प्रथा
‘नाता प्रथा’ राजस्थान के मेवाड़–वागड़ अंचल में सदियों से प्रचलित एक सामाजिक व्यवस्था है, जिसमें महिला पहले वैवाहिक संबंध के समाप्त होने के बाद, समाज की सहमति से दूसरे पुरुष के साथ जीवन व्यतीत कर सकती है। इसमें सात फेरे, विवाह पंजीकरण या विधिवत तलाक जैसी औपचारिकताएँ आवश्यक नहीं होतीं। यह प्रथा विशेषकर विधवा, परित्यक्त या तलाकशुदा महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन देने के उद्देश्य से विकसित हुई।

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