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2035 तक बनेगा भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन, सरकार ने किए 22 हजार करोड़ रुपए मंजूर

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2035 तक बनेगा भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन, सरकार ने किए 22 हजार करोड़ रुपए मंजूर

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इसरो के डॉ. निलेश देसाई बोले- 4 मॉड्यूल पर 70 हजार करोड़ खर्च होंगे, चंद्रयान-4 और नई रडार तकनीक पर भी चल रहा काम

उदयपुर। 29 अगस्त
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने वर्ष 2035 तक अपना भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन तैयार करने का लक्ष्य रखा है। अहमदाबाद स्थित स्पेस एप्लीकेशन सेंटर (SAC) के निदेशक डॉ. निलेश एम. देसाई ने बताया कि अंतरिक्ष स्टेशन का काम वर्ष 2028 से शुरू होगा। इसके पहले मॉड्यूल के लिए भारत सरकार ने 22 हजार करोड़ रुपये की राशि मंजूर कर दी है। इस प्रोजेक्ट में गगनयान मिशन भी शामिल है।
अरावली इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्निकल स्टडीज उदयपुर द्वारा आयोजित इसरो स्पेस एग्जीबिशन में पहुंचे डॉ. देसाई ने कहा कि अंतरिक्ष स्टेशन के लिए कुल चार मॉड्यूल तैयार होंगे। इनमें पहला मानव रहित और उसके बाद दो मानव सहित मिशन होंगे। सभी मॉड्यूल पर कुल 70 हजार करोड़ रुपये की लागत संभावित है, जिसके लिए अतिरिक्त बजट की मांग की जाएगी।
103 सैटेलाइट लांच होंगे, निजी क्षेत्र को मौका
उन्होंने बताया कि इसरो 2062 तक की कार्ययोजना बना चुका है। इस दौरान 103 सैटेलाइट लांच किए जाएंगे, जिनमें से 45 लगातार और शेष आवश्यकता अनुसार होंगे। सरकार की मंशा इस काम में निजी क्षेत्र को भी बढ़ावा देने की है।
चंद्रयान-4 और सेमीकंडक्टर पर काम
डॉ. देसाई ने कहा कि चंद्रयान-4 का प्रोजेक्ट 2028-29 तक पूरा होगा। इसके साथ ही इसरो सेमीकंडक्टर तकनीक में 22 से 28 नैनोमीटर स्तर पर कार्य कर रहा है, जिसमें टाटा समूह निवेश कर रहा है। हालांकि निजी क्षेत्र की भागीदारी अभी 30 प्रतिशत से कम है।
नाविक जीपीएस और रडार तकनीक
उन्होंने बताया कि ‘नाविक जीपीएस’ सिस्टम अगले डेढ़ साल में काम करना शुरू करेगा। इस पर 1999 से प्रयास जारी हैं, लेकिन तकनीकी कारणों से विलंब हुआ। इसरो की नई रडार तकनीक इतनी उन्नत है कि रात और बारिश में भी तस्वीरें स्पष्ट दिखाई देती हैं। इसी तकनीक से चीन के शंघाई एयरपोर्ट की तस्वीरें भी ली गईं। चंद्रयान-3 के कैमरों ने चांद की सतह से तीन फीट से लेकर एक किमी तक की स्पष्ट तस्वीरें लीं, जिनमें नील आर्मस्ट्रांग द्वारा छोड़ा गया सामान भी कैद हुआ।
सियाचिन में सैनिकों को ढूंढने में मदद
नेविगेशन सिस्टम पर जारी रिसर्च से भविष्य में सियाचिन जैसे क्षेत्रों में बर्फीले तूफान में दबे सैनिकों को भी खोजा जा सकेगा। इसके लिए माइनस 60 डिग्री तापमान पर काम करने वाली तकनीक विकसित हो रही है। इसरो द्वारा तैयार नेवी कॉम चिप पहले ही एक लाख समुद्री नावों में लग चुकी है, जिससे किसी भी बाहरी नाव की भारतीय सीमा में एंट्री तुरंत पकड़ में आ जाती है।
सैटेलाइट फोन और उड़न तश्तरी का सच
डॉ. देसाई ने कहा कि अगले 4-5 सालों में स्मार्टफोन सीधे सैटेलाइट से जुड़कर काम करने लगेंगे। इससे दूरस्थ क्षेत्रों में भी नेटवर्क मिल सकेगा। वहीं, उड़न तश्तरी को केवल कल्पना बताते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि वास्तविकता में ऐसा कुछ नहीं है।

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