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इंजीनियर्स डे पर जानें माही डेम से जुड़ी अनसुनी कहानियां

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इंजीनियर्स डे पर जानें माही डेम से जुड़ी अनसुनी कहानियां

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सुभाष शर्मा
उदयपुर, 14 सितम्बर।
इंजीनियरिंग की जड़ें जितनी आधुनिक तकनीकों से जुड़ी हैं, उतनी ही आदिकाल की बुनियादी जरूरतों से भी। गुफाओं में बसेरा बनाने से लेकर पहिये की खोज तक हर कदम सिविल इंजीनियरिंग का शुरुआती अध्याय रहा। आज इंजीनियर्स डे पर जब अभियंता इंजीनियरिंग की यात्रा का जिक्र करते हैं तो आदिमानव से लेकर माही डैम जैसे विशाल निर्माणों तक की रोचक कहानियां सामने आती हैं।
सिविल इंजीनियरिंग को अभियंता मानव सभ्यता का आधार मानते हैं। पेड़ों और गुफाओं में आवास निर्माण से इसकी शुरुआत मानी जाती है। पैदल चलकर बनी पगडंडी सड़कों का रूप बनी, गिरे हुए पेड़ से पुल की कल्पना जन्मी और पहिये ने परिवहन की क्रांति ला दी। वक्त के साथ यह ज्ञान केवल जीने के साधन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आधुनिक विकास की दिशा तय करने लगा।
उदयपुर संभाग के सबसे बड़े माही डैम के निर्माण में भी इंजीनियरिंग की कई अनसुनी कहानियां छुपी हैं। जल संसाधन विभाग के सेवानिवृत्त अधिशासी अभियंता भंवरलाल पांचाल बताते हैं कि इस परियोजना ने न केवल क्षेत्र को पानी की सौगात दी, बल्कि यह तकनीकी दृष्टि से एक बड़ी उपलब्धि भी साबित हुई।
इंजीनियरिंग दूरदर्शिता: जब स्थानीय प्रतिभाओं ने रचा इतिहास
माही डेम की डिजाइन प्रक्रिया भी अत्यंत रोचक रही। केन्द्रीय जल आयोग (CWC) ने डिजाइन की मैन्युअल ड्रॉइंग शुरू की, जो धीमी प्रक्रिया थी। उस समय के चीफ इंजीनियर वी. के. महेश ने सुझाव दिया कि यह कार्य स्थानीय इंजीनियरों से करवाया जा सकता है, क्योंकि वे भी उन्हीं सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेजों से पढ़े हुए थे, जहाँ से CWC के अभियंता आते हैं। बांसवाड़ा में नियुक्त इंजीनियरों ने इस चुनौती को स्वीकार किया, मैन्युअल ड्रॉइंग तैयार की, जिसे CWC ने मान्यता दी। यह एक महत्वपूर्ण कदम था, जिससे परियोजना समय पर शुरू हो सकी — और यह इंजीनियरिंग स्वावलंबन का एक उदाहरण बन गया।
समझौते के तहत बनी थी नर्मदा कैनाल परियोजना


राजस्थान की दक्षिणी सीमा पर स्थित माही डैम न केवल एक विशाल जल परियोजना है, बल्कि यह भारत के जल प्रबंधन इतिहास में एक मील का पत्थर भी है। इसकी नींव 7 मई 1960 को तत्कालीन केंद्रीय वित्त मंत्री मोरारजी देसाई द्वारा रखी गई थी। उसी समय गुजरात में बन रहे कडाणा डेम की ऊँचाई इतनी अधिक थी कि राजस्थान का गलियाकोट कस्बा और आसपास का बड़ा भूभाग उसके डूब क्षेत्र में आ गया था।
यह विवाद 1971 में एक ऐतिहासिक समझौते के बाद सुलझा। इस समझौते में तय हुआ कि माही डेम की ऊँचाई बढ़ाई जाएगी। बदले में गुजरात ने निर्माण लागत का 70% वहन किया और माही जल का 70% हिस्सा माँगा, जिसे राजस्थान सरकार ने स्वीकृति दी। इसी समझौते में नर्मदा कैनाल परियोजना का प्रावधान भी शामिल था, जिसका निर्माण आगे चलकर सांचौर में किया गया।
जब केरल से आए इंजीनियर मौके से भाग निकले…
माही बांध के निर्माण के समय राजस्थान में इंजीनियरों की भारी कमी थी। ऐसे में केरल से कुछ अभियंता बुलाए गए, जिनमें एक थे एईएन के. के. सोमन। लेकिन बांसवाड़ा जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्र की परिस्थिति देखकर वे यहाँ के माहौल से असहज हो गए और लौटने की कोशिश की। उन्हें रतलाम स्टेशन से वापस लाया गया और बांसवाड़ा में रहने-खाने की विशेष व्यवस्था की गई। बाद में वह यहीं के होकर रह गए।
इंदिरा गांधी ने किया उद्घाटन, फोटो तैयार हुआ भाषण से पहले


1 नवम्बर 1983 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने माही डेम का उद्घाटन किया। विशेष बात यह रही कि जिस स्टेज से उन्होंने बटन दबाकर उद्घाटन किया, उसके नीचे एक विशेष ब्लैक रूम तैयार किया गया था। उद्घाटन के तुरंत बाद, वहीं खींचे गए फोटो को डेवलप और प्रिंट कर तत्काल फ्रेम करके भेंट किया गया, जिसे देखकर इंदिरा गांधी भी चकित रह गईं।
पैरों से खींचा नक्शा, आज भी सैटेलाइट से मेल खाता है
माही डेम की डिजाइनिंग आज के डिजिटल युग से कोसों दूर, पूर्णतः मैन्युअल रूप से की गई थी। उस समय एक-एक लाइन खींचने के लिए जूनियर इंजीनियरों को प्रतिदिन पैदल डेम की संभावित रेखा पर चलना होता था। महीनों की मेहनत के बाद जो नक्शा तैयार हुआ, वह आज सेटेलाइट इमेज से पूरी तरह मेल खाता है। यह उस दौर की तकनीकी दक्षता और समर्पण का सजीव प्रमाण है।

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