LOADING

Type to search

आदिवासी अंचल का ‘अपना नेटवर्क’

Local

आदिवासी अंचल का ‘अपना नेटवर्क’

Share

इंटरनेट बंदी का नहीं होता असर, ढोल-नगाड़ों से पहुँचता है हर संदेश
उदयपुर, 3 नवम्बर (राजेश वर्मा): कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए जब भी प्रशासन द्वारा प्रभावित क्षेत्रों में इंटरनेट सेवाएँ बंद की जाती हैं, ताकि अफवाहों पर लगाम लगाई जा सके, तब भी जनजाति (आदिवासी) क्षेत्र के लोगों पर इसका कोई खास फर्क नहीं पड़ता। आदिवासी समुदाय ने सदियों से संदेशों के आदान-प्रदान के लिए अपना एक अनूठा और प्रभावी नेटवर्क विकसित कर रखा है, जो आधुनिक संचार माध्यमों पर निर्भर नहीं है।
ढोल, नगाड़े और संकेत: संदेश भेजने का पारंपरिक तरीका
जनजाति समाज में संदेश पहुंचाने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम ढोल और नगाड़े हैं। आदिवासी एक-दूसरे को खुशी, गम, संकट या सतर्कता जैसे महत्वपूर्ण संदेश इन वाद्यों की अलग-अलग ध्वनियों और लय के माध्यम से बड़ी आसानी से पहुँचाते हैं। डूंगरपुर के काकरी डूंगरी और उदयपुर के खेरवाड़ा जैसे क्षेत्रों में उपद्रव के दौरान जब जिला प्रशासन ने नेटवर्क बंद किया था, तब भी उनका आंतरिक संचार प्रभावित नहीं हुआ।
आदिवासी संस्कृति में यह एक पुरानी परंपरा है कि पुत्र के विवाह के बाद पिता उसे कुछ दूर पहाड़ी पर नया वैवाहिक जीवन शुरू करने के लिए भेजते समय तीन मुख्य चीजें विरासत में देते हैं। उनमें कुल्हाड़ी, तीर—कमान और ढोल शामिल है। कुल्हाड़ी उनके आजीविका चलाने के काम आती है, जबकि तीर—कमान सुरक्षा के लिए। जबकि ढोल संकट या आपात स्थिति में दूर रहे परिजनों—रिश्तेदारों तक संकेत पहुंचाने के लिए।
संकट और सतर्कता के विशिष्ट संकेत
ढोल से निकलने वाली ध्वनि की प्रकृति सुनकर आदिवासी लोग तुरंत यह अंदाजा लगा लेते हैं कि जहाँ से आवाज आ रही है, वहाँ खुशी का माहौल है या कोई गंभीर संकट। जब कभी मौताणा (मृत्यु पर मुआवज़ा) जैसी स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं, तो चढ़ोतरा (इकट्ठा होना) करने आने वालों को देखने पर ढोल बजाकर अपनों को सतर्क कर दिया जाता है। यह संदेश होता है कि या तो घर छोड़कर भाग जाओ या फिर मुकाबले के लिए तैयार हो जाओ।
पारंपरिक ढोल के अलावा आदिवासी लोग मुँह से निकलने वाली सांकेतिक आवाज़ों का भी इस्तेमाल करते हैं। आपराधिक घटना में लिप्त किसी सदस्य को पुलिस की पकड़ से बचाना हो, तो परिवार के सदस्य इन्हीं सांकेतिक आवाज़ों का उपयोग कर उन्हें सतर्क कर देते हैं। इसी गुप्त और त्वरित नेटवर्क के कारण, पुलिस को कई बार कमलिया, रणिया डकैत और अन्य अपराधियों को पकड़ने में असफलता मिली है। ऐसे मामलों में, पुलिस के लिए केवल मुखबिरी (गुप्त सूचना) ही सफलता का एकमात्र सहारा बचता है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *