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आदिवासी संस्कृति में अब भी जीवित है ‘आत्मा ले जाने’ की परंपरा

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आदिवासी संस्कृति में अब भी जीवित है ‘आत्मा ले जाने’ की परंपरा

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ढोल-धमाकों और दीपक की ज्योति के बीच परिवारजन मृत आत्मा को घर लाकर करते हैं पूजा-अर्चना
डूंगरपुर, 5 नवम्बर (विजन 360 न्यूज डेस्क):
आधुनिक युग में जहां परंपराएं धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही हैं, वहीं राजस्थान के आदिवासी बहुल डूंगरपुर जिले में आज भी कई प्राचीन परंपराएं गहरी आस्था और विश्वास के साथ निभाई जा रही हैं। इन्हीं में से एक है—“आत्मा ले जाने” की परंपरा, जिसमें मृत व्यक्ति की आत्मा को पूजा-पाठ के साथ घर लाया जाता है। यह परंपरा स्थानीय समाज में आध्यात्मिकता और सांस्कृतिक जुड़ाव का प्रतीक मानी जाती है।
डूंगरपुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल परिसर में इस परंपरा का दृश्य देखने को मिला, जब दो परिवार अपने दिवंगत परिजनों की आत्मा ‘लेने’ पहुंचे। परिवारजनों ने उस स्थान पर पूजा-अर्चना की, जहां उनके प्रियजन ने अंतिम सांस ली थी। फूल-मालाओं, कुमकुम और दीपक से सजी पूजा के बीच आत्मा के प्रतीक स्वरूप दीपक जलाया गया। ढोल-धमाकों और मंत्रोच्चारण के साथ परिवारजन उस दीपक को लेकर घर लौटे। घर पहुंचने पर दीपक को पूजा-घर में अखंड ज्योति के रूप में स्थापित किया जाता है, जो शांति और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
महुआवाड़ा निवासी मणिलाल ताबियाड़ ने बताया कि उसके बेटे रामलाल की एक वर्ष पूर्व जिला अस्पताल में मृत्यु हुई थी। मंगलवार को परिवार उसी वार्ड में पहुंचा और पूजा कर दीपक को घर लाया। उनका विश्वास है कि इस पूजा से आत्मा भटकती नहीं और परिवार पर संकट नहीं आता।
समाजसेवी जीवालाल ने बताया कि यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। इसमें मृतक के परिजन उस स्थान पर जाकर आत्मा को प्रतीक रूप में दीपक की ज्योति के साथ घर लाते हैं। उन्होंने कहा कि यह केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और परिवारिक भावनाओं को मजबूत करने का प्रतीक भी है। यह परंपरा मृत व्यक्ति के प्रति सम्मान और समाज में सांस्कृतिक निरंतरता बनाए रखने का संदेश देती है।

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