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राज्य स्तरीय कार्यक्रम में जीवंत होंगी जनजातीय काष्ठ परम्पराएं

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राज्य स्तरीय कार्यक्रम में जीवंत होंगी जनजातीय काष्ठ परम्पराएं

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डूंगरपुर में भगवान बिरसा मुंडा जयंती पर प्रदर्शित होंगी लकड़ी की दुर्लभ कलाकृतियां
उदयपुर, 10 नवम्बर (राकेश शर्मा राजदीप):
भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जन्म जयंती के उपलक्ष्य में मनाए जा रहे जनजातीय गौरव वर्ष पखवाड़ा के तहत माणिक्यलाल वर्मा आदिम जाति शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान, उदयपुर में छह दिवसीय राज्य स्तरीय काष्ठकला कार्यशाला में जनजातीय परम्परा और सृजन का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है। कार्यशाला में उदयपुर, राजसमंद, डूंगरपुर, बांसवाड़ा और सिरोही जिले के 25 प्रतिभाशाली काष्ठ शिल्पी भाग ले रहे हैं, जो अपनी कारीगरी से राजस्थान की लोक कला की पहचान को जीवंत बना रहे हैं।
इन कलाकारों द्वारा सागवान, नीम, आम, अडूसा, साल, खिरनी और बबूल जैसी लकड़ियों पर बारीकी से नक्काशी कर लोक देवी-देवताओं, जनजीवन से जुड़े दृश्यों, घरेलू और कृषि उपयोगी पारम्परिक औजारों तथा मुखौटों का निर्माण किया जा रहा है। यह कार्यशाला जनजातीय कला की उस गहराई को सामने लाती है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तकौशल और संस्कृति के रूप में प्रवाहित होती रही है।
कार्यशाला समन्वयक डॉ. दिनेश उपाध्याय ने बताया कि तैयार की जा रही सभी काष्ठ कलाकृतियों को 15 नवम्बर को डूंगरपुर में आयोजित होने वाले राज्य स्तरीय कार्यक्रम में प्रदर्शित किया जाएगा, जो इस आयोजन का मुख्य आकर्षण होंगी।
उन्होंने बताया कि कार्यशाला में वरिष्ठ कलाकार खेमराज डिंडोर और वाडीलाल के साथ-साथ युवा कलाकार दिलीप डामोर, डिम्पल चंडात, डॉ. यशपाल बरण्डा, चंद्रिका परमार, प्रभुलाल गमेती, नवीनचंद्र और मोतीलाल अपनी सृजनधर्मी कला से जनजातीय परम्पराओं को नये जीवन में ढाल रहे हैं।
डॉ. उपाध्याय ने बताया कि संस्थान परिसर की नवनिर्मित बाउंड्री वॉल पर उकेरी जा रही ट्राइबल आर्ट भी इस अवसर पर एक विशेष आकर्षण होगी, जिसका लोकार्पण 14 नवम्बर को जनजाति क्षेत्रीय विकास मंत्री बाबूलाल खराड़ी करेंगे। उन्होंने कहा कि यह कार्यशाला केवल कला प्रदर्शन का मंच नहीं, बल्कि जनजातीय संस्कृति की जड़ों को सहेजने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम है।

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