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स्कूल ने ठुकराया, पर हौसले ने दिलाई पहचान

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स्कूल ने ठुकराया, पर हौसले ने दिलाई पहचान

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सिर्फ 10% नजर, लेकिन पूरे आत्मविश्वास से राजस्थान ब्लाइंड क्रिकेट टीम के कप्तान बने मुकेश जाट
चित्तौड़गढ़, 11 नवंबर:
“अंधा है, पढ़ नहीं पाएगा” — ये शब्द 24 वर्षीय मुकेश जाट के बचपन में सुनने को रोज मिलते थे। स्कूलों ने एडमिशन देने से मना कर दिया, पर मुकेश ने हार नहीं मानी। सुनकर पढ़ने वाले इस बालक ने वही दुनिया जीती, जिसने उसे ठुकराया था। आज वही मुकेश राजस्थान ब्लाइंड क्रिकेट टीम के कप्तान हैं और उदयपुर संभाग के नेत्रहीन खिलाड़ियों के कोऑर्डिनेटर भी हैं।
कैंपों में की पढ़ाई, सुनकर करते थे याद
चित्तौड़गढ़ जिले की गंगरार तहसील के रहने वाले मुकेश बचपन से ही होशियार थे, लेकिन आंखों की रोशनी केवल 10 प्रतिशत थी। जब उन्होंने पढ़ाई की इच्छा जताई तो किसी भी स्कूल ने दाखिला नहीं दिया। तब माता-पिता ने जिला शिक्षा अधिकारी से मदद मांगी और मुकेश को 9-9 महीने के विशेष कैंपों में पढ़ाई का मौका मिला।
वहां मुकेश ने ब्लैकबोर्ड की जगह टीचर की आवाज़ से ज्ञान अर्जित किया। उन्होंने सुनकर सब याद किया और पांचवीं कक्षा की मौखिक परीक्षा में फर्स्ट आए।
शिक्षक हेमेंद्र सोनी ने बदली जिंदगी
मुकेश की मुलाकात शिक्षक हेमेंद्र सोनी से हुई, जिन्होंने उन्हें ब्रेल लिपि सिखाई और उदयपुर ब्लाइंड स्कूल भेजा। मुकेश कहते हैं— “हेमेंद्र सर ने न केवल मुझे ब्रेल सिखाई, बल्कि जीवन में आगे बढ़ने का आत्मविश्वास भी दिया।”
खेलों में चमके, जीता नेशनल सिल्वर मेडल
पढ़ाई के साथ मुकेश को खेलों का जुनून था। क्रिकेट और कबड्डी दोनों में उन्होंने उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। बचपन में लोग कहते थे— “देख नहीं सकता तो खेलेगा कैसे?” — लेकिन उन्होंने सबको गलत साबित किया। मुकेश ने नेशनल ब्लाइंड क्रिकेट प्रतियोगिता में सिल्वर मेडल जीता और आज टीम के कप्तान हैं। उनके नेतृत्व में राजस्थान टीम लगातार शानदार प्रदर्शन कर रही है।
आत्मविश्वास बना सफलता की कुंजी
मुकेश ने 12वीं के बाद BSTC और पशु प्रशिक्षण परीक्षा भी दी है। वे वर्तमान में BA प्रथम वर्ष में अध्ययनरत हैं और कहते हैं— “मैंने कभी हार नहीं मानी, बस खुद पर भरोसा रखा।”

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