स्वदेशी रोटावायरस वैक्सीन अंतरराष्ट्रीय टीकों जितनी प्रभावी
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उदयपुर के डॉ. भूपेश जैन का अध्ययन नेचर मेडिसिन जर्नल में प्रकाशित
उदयपुर, 16 नवम्बर : भारत में उपयोग होने वाली स्वदेशी रोटावायरस वैक्सीन रोटावैक की प्रभावशीलता अंतरराष्ट्रीय टीकों के बराबर पाई गई है। यह निष्कर्ष एक बहु-केन्द्रीय अध्ययन में सामने आया है, जिसका प्रकाशन दुनिया की प्रतिष्ठित अमेरिकन नेचर मेडिसिन जर्नल में 7 अक्टूबर 2025 को हुआ। इस शोध में आरएनटी मेडिकल कॉलेज, उदयपुर के शिशु रोग विशेषज्ञ प्रो. डॉ. भूपेश जैन और प्रो. डॉ. सुरेश गोयल की महत्वपूर्ण वैज्ञानिक भूमिका रही।
2016 से 2020 के बीच सीएमसी वेल्लोर के नेतृत्व में किए गए इस शोध में 9 राज्यों के 31 अस्पताल शामिल थे, जिनमें कुल 24,624 बच्चे अध्ययन का हिस्सा बने। प्रभावशीलता मूल्यांकन समूह में 6–59 माह आयु के 8,372 बच्चों को शामिल किया गया। अध्ययन में पाया गया कि रोटावैक की तीन डोज़ लेने वाले बच्चों में रोटावायरस संक्रमण से कुल सुरक्षा 54% रही, जबकि गंभीर संक्रमण और अस्पताल में भर्ती होने वाले मामलों में 40% से अधिक की कमी दर्ज की गई। वायरस के प्रमुख जीनोटाइप G1P[8] के खिलाफ वैक्सीन की असरकारकता 64% देखी गई।
रोटावायरस हर वर्ष विश्वभर में लगभग 1.25 लाख बच्चों की जान लेता है, और भारत में यह पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों में अस्पताल भर्ती का प्रमुख कारण है। ऐसे में स्वदेशी रोटावैक का राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में मजबूत प्रदर्शन भारत की वैज्ञानिक क्षमता और स्वास्थ्य ढांचे की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। डॉ. जैन के अनुसार स्वदेशी रोटावैक ने देश में बच्चों में होने वाले गंभीर संक्रमण के बोझ को कम करने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
