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मानगढ़ कांड: 17 नवंबर 1913 का वह दिन, जब निहत्थे आदिवासियों पर बरसी थीं गोलियां

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मानगढ़ कांड: 17 नवंबर 1913 का वह दिन, जब निहत्थे आदिवासियों पर बरसी थीं गोलियां

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गोविंद गुरु के नेतृत्व में उठी सामाजिक जागृति को विद्रोह समझ अंग्रेजों ने किया था नरसंहार

सुभाष शर्मा
उदयपुर, 16 नवम्बर :
आज ही के दिन 17 नवंबर 1913 को वागड़ अंचल के आदिवासी इतिहास का सबसे दर्दनाक अध्याय लिखा गया था—मानगढ़ कांड। बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, पंचमहल, सिरोही, रतलाम व झाबुआ जैसे आदिवासी क्षेत्रों में उस समय अज्ञान, अत्याचार और शोषण का गहरा अंधकार फैला था। इन्हीं परिस्थितियों में सामाजिक सुधारक गोविंद गुरु ने जनजागरण का अभियान शुरू किया, जिसे अंग्रेज शासन ने विद्रोह समझ लिया और निहत्थे भीलों पर गोलियां चलाकर भयानक नरसंहार कर दिया।
गोविंद गुरु: सामाजिक सुधारक जिन्हें विद्रोही समझा गया
20 दिसंबर 1858 को डूंगरपुर जिले के बांसिया (बेड़िया) गांव में जन्मे गोविंद गुरु मूलतः बंजारा समाज से थे। जिज्ञासु स्वभाव और यात्राओं के कारण वे विभिन्न संतों के संपर्क में आए और उदयपुर प्रवास के दौरान स्वामी दयानंद सरस्वती से गहराई से प्रभावित हुए। वर्ष 1899 के दुर्भिक्ष में पत्नी के निधन के बाद उन्होंने संन्यास ले लिया और वागड़ क्षेत्र में “संपसभा” की स्थापना कर बेगार, नशाखोरी और कुरीतियों के खिलाफ अभियान छेड़ दिया। उनके उपदेशों से प्रभावित होकर हजारों आदिवासी उनके अनुयायी बने, जिससे तत्कालीन शासकों को यह भ्रम हुआ कि वे विद्रोह की तैयारी कर रहे हैं।
मानगढ़ में जुटा जनसमूह और हुआ भीषण हमला
पहले डूंगरपुर और फिर अन्य स्थानों से दबाव झेलने के बाद गोविंद गुरु मानगढ़ पहाड़ी पर डेरा डाले हुए थे। यहां उनके अनुयायी सामाजिक और आध्यात्मिक सभा के लिए जुटते थे। लेकिन अंग्रेजी हुकूमत ने इसे बगावत समझ लिया। 17 नवंबर 1913 को अंग्रेज सेना और रियासती फौज ने मानगढ़ पहाड़ी पर हमला कर निहत्थे आदिवासियों पर गोलियां बरसा दीं। दस्तावेज बताते हैं कि आदिवासियों ने कोई प्रतिरोध नहीं किया था, वे केवल सभा के लिए एकत्रित हुए थे।
गिरफ्तारी, मुकदमा और झूठे आरोप
नरसंहार के बाद गोविंद गुरु को गिरफ्तार कर अहमदाबाद जेल भेजा गया। फरवरी 1914 में उन पर पुलिसकर्मी की हत्या का ‘मास्टरमाइंड’ होने का आरोप लगाकर फांसी की सजा सुनाई गई, जिसे अपील में बदलकर आजीवन कारावास और बाद में 10 वर्ष कर दिया गया। अध्ययन बताते हैं कि आरोप आधारहीन थे—जिस अधिकारी ने फांसी सुनाई, उसी ने बाद में सजा कम करने की अनुशंसा भी की। इससे सिद्ध होता है कि पूरा मामला अंग्रेजी दमन की उपज था।
मानगढ़ कांड: अब भी अनकही पीड़ा
मानगढ़ के बारे में सेवानिवृत अधिशासी अभियंता भंवर पांचाल बताते हैं कि मानगढ़ कांड भारतीय आदिवासी समुदाय के सबसे बड़े नरसंहारों में से एक है। निहत्थे अनुयायियों को मारने के बाद भी ब्रिटिश अधिकारी यह तय करने में दिनों तक उलझे रहे कि गोविंद गुरु पर क्या आरोप लगाया जाए।
राष्ट्रीय स्मारक का नहीं मिला दर्जा
राजस्थान के ‘जलियांवाला बाग’ कहे जाने वाले मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की मांग वर्षों से लंबित है। 1 नवंबर 2022 को पीएम नरेंद्र मोदी मानगढ़ पहुंचे थे और उम्मीद थी कि स्मारक की घोषणा होगी, पर ऐसा नहीं हुआ। मानगढ़ में आयोजित सभा में पीएम ने राजस्थान सहित चार राज्यों के मुख्यमंत्रियों पर इसका फैसला संयुक्त रूप से लिए जाने की बात कही थी। लोकसभा में उदयपुर से भाजपा सांसद डॉ. मन्नालाल रावत भी इस धाम को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की मांग उठा चुके हैं। आदिवासियों के बलिदान का प्रतीक यह धाम अब भी राष्ट्रीय स्मारक का इंतजार कर रहा है।

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