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मातृकुण्डिया पैनोरमा पर 18 करोड़ खर्च करने का प्रस्ताव निरस्त, कोर्ट ने लगाई स्थायी रोक

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मातृकुण्डिया पैनोरमा पर 18 करोड़ खर्च करने का प्रस्ताव निरस्त, कोर्ट ने लगाई स्थायी रोक

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श्री सांवलियाजी मंदिर मंडल को झटका
चित्तौड़गढ़, 17 नवम्बर (विजन 360 न्यूज डेस्क):
जिले के मंडफिया स्थित प्रसिद्ध श्री सांवलियाजी मंदिर मंडल को न्यायिक झटका लगा है। सिविल न्यायाधीश मंडफिया के न्यायालय ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए मंदिर मंडल द्वारा मातृकुण्डिया परशुराम पैनोरमा योजना के लिए मंदिर निधि से ₹18 करोड़ की राशि खर्च करने के प्रस्ताव को निरस्त कर दिया है। न्यायालय ने मंदिर मंडल को स्थायी निषेधाज्ञा से पाबंद करते हुए यह राशि किसी भी सूरत में खर्च न करने का निर्देश दिया है।
यह फैसला स्थानीय निवासी मदन जैन व अन्य द्वारा वर्ष 2018 में दायर एक जनहित याचिका का निस्तारण में आया। वादीगण ने आरोप लगाया था कि मंदिर मंडल के पदाधिकारी राजनीतिक दबाव के चलते भक्तों द्वारा चढ़ाए गए धन का दुरुपयोग कर रहे हैं ।
वादीगण ने न्यायालय को बताया कि श्री सांवलिया जी मंदिर मंडल अधिनियम, 1992 की धारा 28 का मुख्य उद्देश्य मंदिर में आने वाले यात्रियों को अधिकतम सुविधाएं प्रदान करना और मंदिर परिक्षेत्र के 16 गांवों में विकास कार्य करवाना है। जबकि, मंडल इन उद्देश्यों का उल्लंघन कर रहा है। आज भी मंदिर परिसर में यात्रियों के ठहरने के लिए विस्तृत धर्मशालाओं, पीने के पानी, आधुनिक शौचालय, स्वच्छ भोजनालय और उच्च स्तरीय चिकित्सा/शैक्षणिक संस्थाओं का अभाव है। इन मूलभूत सुविधाओं को पूरा किए बिना, मंडल द्वारा 12 अप्रैल 2018 को मातृकुण्डिया (जो 16 गांवों के परिक्षेत्र से बाहर है) में परशुराम पैनोरमा के निर्माण के लिए 18 करोड़ रुपये देने का निर्णय लिया गया, जो कि मंदिर निधि का दुरुपयोग है।
न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि मंदिर निधि श्रद्धालुओं द्वारा धार्मिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए देवता में आस्था रखते हुए दिए गए दान और चढ़ावे से निर्मित होती है। अधिनियम की धारा 4 के अनुसार यह निधि ‘देवता की संपत्ति’ है और मंदिर मंडल केवल उसका प्रबंधक है।
न्यायालय ने माना कि मंदिर निधि राज्य सरकार का खजाना नहीं है, और इसका उपयोग मुख्यमंत्री की बजट घोषणा की पूर्ति के लिए नहीं किया जा सकता है। मंडल द्वारा उठाया गया ₹18 करोड़ का प्रस्ताव अधिनियम की धारा 28 में वर्णित उद्देश्यों से परे और विधायिका की मंशा के विपरीत होने के कारण स्वेच्छाचारिता पूर्ण है। जनहित वाद में आमजन की ओर से प्रभावी अधिवक्ता उमेश आगार द्वारा की गई।
न्यायालय ने वादीगण के पक्ष में फैसला सुनाते हुए निम्नलिखित निर्देश जारी किए
श्री मातृकुंडिया तीर्थ स्थल के विकास के लिए ₹18 करोड़ जारी करने के दिनांक 12.04.2018 के प्रस्ताव संख्या 01/2018 को निरस्त घोषित किया जाता है।
श्री सांवलिया जी मंदिर मंडल को स्थायी रूप से पाबंद किया जाता है कि वह उक्त प्रस्ताव के अनुसरण में मंदिर निधि से कोई राशि खर्च/जारी न करे।
यदि उक्त प्रस्ताव की पालना में कोई धनराशि पहले ही जारी की गई हो, तो उसे इस निर्णय की दिनांक से आगामी दो माह के भीतर पुनः मंदिर निधि में जमा करवाया जाए।
मंदिर मंडल को निर्देश दिया जाता है कि वह भविष्य में अधिनियम की धारा 28 में वर्णित प्रयोजनों के अनुरूप ही निधि का उपयोग करे। इस निर्णय को मंदिर से जुड़े भक्तों और स्थानीय निवासियों के लिए एक बड़ी जीत माना जा रहा है।

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