SC/ST एक्ट केवल जाति के आधार पर लागू नहीं, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया
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10 साल से कम सजा वाले अपराध दायरे से बाहर
प्रतापगढ़, 3 दिसम्बर: राजस्थान हाईकोर्ट ने अहम फैसले में कहा है कि अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(2)(v) केवल तभी लागू हो सकती है जब अपराध आईपीसी के तहत 10 साल या उससे अधिक की सजा वाला हो और अपराध जातिगत विद्वेष के कारण किया गया हो। जस्टिस फरजद अली की एकल पीठ ने प्रतापगढ़ के 30 साल पुराने मामले में तीन भाइयों को SC/ST एक्ट के आरोपों से बरी किया, लेकिन अतिक्रमण (Trespass) के मामले में दोषी माना।
30 साल पुराना जमीन विवाद, जातिगत हमला नहीं
प्रतापगढ़ के सेलारपुरा निवासी कालू, रुस्तम और वाहिद खान ने 1995 में ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। अभियोजन के अनुसार, परिवादी राधी ने आरोप लगाया कि आरोपियों ने उसकी जमीन पर अतिक्रमण किया और मारपीट की। हाईकोर्ट ने पाया कि विवाद केवल पगडंडी के रास्ते को लेकर था, न कि जातिगत भावना से प्रेरित।
कोर्ट ने कहा – कानून का यांत्रिक उपयोग न करें
जस्टिस फरजद अली ने लिखा कि SC/ST एक्ट लागू करने के लिए दो शर्तें अनिवार्य हैं: IPC के तहत किया गया अपराध जिसमें 10 साल या अधिक की सजा का प्रावधान हो। अपराध जातिगत पहचान के कारण किया गया हो। कोर्ट ने नोट किया कि अतिक्रमण की धारा 447 के तहत अधिकतम सजा केवल 3 महीने की है। इसलिए SC/ST एक्ट की धारा 3(2)(v) लागू नहीं हो सकती।
मानवीय दृष्टिकोण से सजा में राहत
कोर्ट ने दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए कहा कि अपीलार्थी अब वृद्ध हो चुके हैं और 30 साल से अधिक समय बीत चुका है। पुराने जेल का समय पर्याप्त सजा माना जाएगा। जमानत मुचलके खारिज कर दिए गए हैं।
