”महादेव की सौगंध खाता हूं, आदिवासी को अलग धर्म बताने की साजिश करेंगे बेनकाब”
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सांसद मन्नालाल रावत का बड़ा बयान
ऐतिहासिक तथ्यों और दस्तावेजों का हवाला देकर कहा—आदिवासी हिंदू संस्कृति से जुड़े, भ्रम फैलाने वालों का पर्दाफाश होगा
पादरी विलियम एडम से शुरू हुई थी कथित ‘अलग धर्म’ की कहानी, रांची कैथोलिक चर्च के ज्ञापन का भी उदाहरण
उदयपुर, 5 दिसम्बर: उदयपुर सांसद डॉ. मन्नालाल रावत ने आदिवासी समाज को अलग धर्म बताने की मुहिम को सुनियोजित साजिश बताते हुए बड़ा बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि राजस्थान के दक्षिण अंचल सहित मध्यप्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़ और झारखंड से जुड़े आदिवासी समुदाय का इतिहास, परंपरा और सांस्कृतिक आधार हिंदू धर्म से अभिन्न रूप से जुड़े हैं।
सांसद रावत ने कहा कि आदिवासी अलग धर्म है, यह भ्रम सबसे पहले एक पादरी विलियम एडम ने 1950 के दशक में फैलाया था। वह मध्यप्रदेश के महाकौशल क्षेत्र में सक्रिय था। उसने एक आदिवासी महिला कौशल्या से विवाह कर खुद के आदिवासी धर्म अपनाने की बात कही थी। उसने अपनी पत्नी कौशल्या का नाम बदलकर कोशी रखा और एक सुनियोजित योजना के तहत आदिवासी समुदाय को हिंदू समाज से अलग दिखाने का अभियान चलाया। उसकी इस चाल का असर करीब दस–बारह वर्षों बाद तब दिखा जब उसने अपने दोनों बच्चों को ईसाई धर्म से जोड़ा।
रावत ने कहा कि दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि रांची के कैथोलिक चर्च द्वारा दिए गए एक ज्ञापन में पहली बार आदिवासियों के लिए अलग धर्म कोड की मांग उठाई गई। इससे स्पष्ट होता है कि ‘अलग धर्म’ का मुद्दा आदिवासियों की इच्छा नहीं, बल्कि बाहरी शक्तियों द्वारा खड़ा किया गया भ्रम है।
उन्होंने कहा, “मैं आदिदेव महादेव की सौगंध खाकर कहता हूं कि जल्द ही इस साजिश को बेनकाब किया जाएगा।” उन्होंने आदिवासी लेखक लक्ष्मण डोगरे की पुस्तक ‘हाँ, हम हिंदू हैं’ का उल्लेख करते हुए कहा कि यह रचना आदिवासियों की सांस्कृतिक जड़ों को तथ्यपरक रूप से दुनिया के सामने रखती है। सांसद रावत ने आदिवासी समुदाय से अपील की कि वे इतिहास, संस्कृति और परंपरा को समझें तथा किसी भी भ्रामक प्रचार से सावधान रहें।
