पंडित नरेंद्र मिश्र ने निधन से दो दिन पहले लिखी थी वंदेमातरम पर अंतिम कविता
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वीर रस के राष्ट्रीय स्तर के कवि पं. नरेंद्र मिश्र ने चित्तौड़गढ़ में ली अंतिम सांस, गोरा—बादल जैसी ऐतिहासिक कविता से मिली प्रसिद्ध
चित्तौड़गढ़, 10 दिसम्बर: राष्ट्रीय स्तर के वीर रस के कवि पंडित नरेंद्र मिश्र का मंगलवार को निधन हो गया। वे 88 वर्ष के थे और कुछ समय से बीमार चल रहे थे। उनके निधन की खबर से साहित्य जगत, शिक्षा क्षेत्र और सामाजिक संगठनों में शोक की लहर फैल गई।
पंडित मिश्र का जन्म 5 मई 1937 को उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले में हुआ। वे 10वीं कक्षा में ही ‘गोरा-बादल’ जैसी ऐतिहासिक कविता लिख चुके थे। मेवाड़ के इतिहास और संस्कृति पर उनके योगदान के लिए उन्हें तत्कालीन महाराणा भगवत सिंह ने ‘मेवाड़ के राजकवि’ का सम्मान दिया। उन्होंने मोहनलाल सुखाड़िया यूनिवर्सिटी, महाराणा प्रताप कृषि विश्वविद्यालय और माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान के कुलगीत भी रचे।
विलक्षण बात यह है कि अपने निधन से दो दिन पहले ही पंडित मिश्र ने वंदेमातरम पर अंतिम कविता लिखी थी। इसमें उन्होंने शहीदों के बलिदान और देशभक्ति की भावना को शब्दों में जीवंत किया:
“आस्था की अस्मिता की शान वंदेमातरम… भरत भू की आन की पहचान वंदेमातरम… जो तिरंगे के लिए सिर पर कफन बांधे रहे… उन अमर शहीदों का बलिदान वंदेमातरम…”
पंडित मिश्र ने अपने साहित्यिक जीवन में ‘हल्दीघाटी’, ‘पद्मिनी’, ‘हुमायूं की राखी’, ‘जौहर की ज्वाला अविनाशी’ जैसी रचनाएं लिखीं, जिनमें मेवाड़ की वीरता और मातृत्व शक्ति की झलक मिलती है। उन्होंने लाल किले से 18 बार मेवाड़ का प्रतिनिधित्व किया। उनके साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें महाराणा कुम्भा सम्मान, निराला सम्मान, तांत्या टोपे सम्मान, राजस्थान साहित्य अकादमी और कई प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त हुए। पंडित मिश्र अपनी सादगी, विनम्रता और देशभक्ति की भावना के लिए याद किए जाएंगे।
