हाईकोर्ट का मानवीय फैसला: 8 साल सजा काटी मानकर महिला को रिहा, दोबारा जेल भेजना अमानवीय
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22 साल पुराने मामले में तथ्यात्मक भूल पर न्याय का मानवीय पक्ष
कोर्ट बोली—सिस्टम की गलती की सजा गरीब महिला क्यों भुगते
उदयपुर, 16 दिसम्बर: राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने 22 साल पुराने एक आपराधिक मामले में मानवीय और सुधारवादी दृष्टिकोण अपनाते हुए एक दुर्लभ फैसला सुनाया है। कोर्ट ने 55 वर्षीय आदिवासी महिला को दोबारा जेल भेजने से इनकार करते हुए कहा कि सिस्टम की गलती का खामियाजा किसी गरीब महिला से नहीं वसूला जा सकता। कोर्ट ने महिला की 2 साल की सजा को ही पर्याप्त मानते हुए उसे शेष सजा से मुक्त कर दिया।
जस्टिस फरजंद अली और जस्टिस आनंद शर्मा की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि वर्ष 2011 के फैसले में हुई गंभीर तथ्यात्मक भूल के कारण महिला को पहले ही 8 साल की सजा काटी हुई मानकर रिहा कर दिया गया था, जबकि वास्तविकता में वह केवल करीब 2 साल ही जेल में रही थी। कोर्ट ने कहा कि 20 साल बाद शेष सजा के लिए उसे वापस जेल भेजना न न्यायसंगत है और न ही मानवीय।
क्या है पूरा मामला: घटना वर्ष 2003 की है और बांसवाड़ा के एक दुर्गम पहाड़ी गांव से जुड़ी है। काली नामक महिला के पति कांति शराब और चिकन लेकर घर आए थे। देर से खाना परोसने को लेकर दोनों में विवाद हुआ, जो हाथापाई में बदल गया। क्षणिक आवेश में काली ने कुल्हाड़ी से एक वार किया, जिससे पति की मौत हो गई। ट्रायल कोर्ट ने 2004 में काली को उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
2011 के फैसले में हुई चूक: हाईकोर्ट ने 2011 में सजा को हत्या से गैर-इरादतन हत्या में बदलते हुए यह मान लिया कि महिला 8 साल जेल में रह चुकी है और उसे रिहा कर दिया। बाद में सामने आया कि यह जानकारी गलत थी और यह चूक रजिस्ट्री, ट्रायल कोर्ट और सरकारी वकीलों के बीच संचार की कमी के कारण हुई।
कोर्ट की अहम टिप्पणी: कोर्ट ने कहा कि यह घरेलू विवाद बिना पूर्व योजना के हुआ था, एक ही वार किया गया और महिला का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। कोर्ट ने टिप्पणी की—“वैधव्य और जीवनभर का संघर्ष ही इस महिला के लिए सबसे बड़ी
