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अरावली पर्वतमाला: इतिहास गवाह है—राजा-महाराजाओं ने अरावली को काटा नहीं, संवारा

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अरावली पर्वतमाला: इतिहास गवाह है—राजा-महाराजाओं ने अरावली को काटा नहीं, संवारा

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शासकों ने प्रकृति के साथ युद्ध नहीं, सह-अस्तित्व चुना
सुभाष शर्मा
उदयपुर, 22 दिसंबर:
राजस्थान की जीवन रेखा कही जाने वाली अरावली पर्वतमाला आज संरक्षण और विनाश के बीच खड़ी है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश सौ मीटर ऊंचाई वाली पहाड़ी अरावली नहीं, के आदेश के साथ वर्तमान समय में जब पहाड़ों के कटाव और अंधाधुंध खनन पर बहस हो रही है, तब इतिहास का पन्ना यह स्पष्ट करता है कि राजा-महाराजाओं ने कभी अरावली को नुकसान पहुँचाने का मार्ग नहीं चुना।
उन्होंने पहाड़ों को तोड़ने के बजाय प्राकृतिक भू-आकृति के अनुरूप दुर्गों का निर्माण किया—जो आज भी मजबूती से खड़े हैं। अरावली पर बने सभी किलों में एक बात समान देखी जा सकती है कि किसी भी शासक ने पहाड़ों को विस्फोट कर नहीं तोड़ा और ना ही समतलीकरण कराया। सभी ने प्राकृतिक जल-प्रणालियों का सम्मान किया और सभी ने पहाड़ियों को रक्षा कवच की तरह अपनाया। कहा जा सकता है कि शासक जो भी रहे, सभी ने अरावली को सम्मान दिया। इस मामले में पर्यावरणविदों का कहना है कि सभी शासकों के ऐतिहासिक निर्माण पर्यावरणीय संतुलन के बेहतर निर्माण है। सरकारों को भी अरावली का सम्मान करना चाहिए, जो बेहद बेहद जरूरी है।


अरावली पर बने किले : पत्थर नहीं काटे, पहाड़ों को आधार बनाया
अरावली पर्वतमाला पर या उसकी श्रेणियों एवं पादप्रदेश में बने किले इस बात के जीवित प्रमाण हैं कि ऐतिहासिक निर्माण पर्यावरणीय संतुलन के साथ किया गया।
मेवाड़, ढूंढाड़ और मेवात : अरावली के रक्षक दुर्ग
चित्तौड़गढ़ दुर्ग (चित्तौड़गढ़): 7वीं से 16वीं शताब्दी के बीच बना चित्तौड़गढ़ दुर्ग अरावली की अरावली की ऊँची पहाड़ी पर स्थित है। यह मेवाड़ की राजधानी, शौर्य और जौहर का प्रतीक कहलाता है।
कुंभलगढ़ दुर्ग (राजसमंद): 1443 से 1458 ई. के दौरान बने कुंभलगढ़ दुर्ग का निर्माण महाराणा कुम्भा ने कराया था। जो अपनी 36 किलोमीटर लंबी प्राचीर के लिए प्रसिद्ध है। यह चीन की दीवार के बाद दूसरी सबसे लंबी दीवार है। अरावली की दुर्गम पहाड़ियों में निर्मित इसी कुंभलगढ़ दुर्ग में ही महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था।
रणथंभौर दुर्ग (सवाई माधोपुर): 10वीं शताब्दी में निर्मित यह दुर्ग अरावली–विंध्य की संगम श्रृंखला पर स्थित है और सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण दुर्ग रहा।
जयपुर क्षेत्र : पहाड़ियों को काटे बिना राजधानी की सुरक्षा
आमेर दुर्ग, जयगढ़ और नाहरगढ़
: जयपुर में बने यह किले 1592 से 1734 ई. के बीच निर्मित हुए। अरावली की पहाड़ियों पर निर्मित त्रि-दुर्ग प्रणाली आधारित इन किलों ने जयपुर नगर की रक्षा की। तीनों दुर्ग बिना पर्वत काटे, प्राकृतिक ऊँचाइयों का उपयोग करके बनाए गए।


दक्षिणी अरावली : प्राकृतिक ऊँचाइयों पर स्थापत्य का सम्मान
दक्षिणी अरावली पर माउंट आबू का अचलगढ़ दुर्ग मौजूद है। जिसका निर्माण 14वीं शताब्दी में हुआ था। यह दुर्ग अरावली की उच्चतम श्रेणियों में स्थित है।
उदयपुर का सज्जनगढ़ पैलेस: इस किले को मानसून पैलेस के नाम से भी जाना जाता है। इसका निर्माण 1884 ई. में कराया गया था। अरावली की चोटी पर स्थित इस दुर्ग को बिना पहाड़ी को नुकसान पहुंचाए बनवाया गया। जिसका उद्देश्य वर्षा वेधशाला के रूप में भी किया जाता रहा है
मारवाड़ और पश्चिमी राजस्थान के लिए भी बेहतर उदाहरण
जोधपुर में 1459 ई में बनकर तैयार प्रसिद्ध मेहरानगढ़ दुर्ग अरावली की पश्चिमी शाखा की 400 फीट ऊंची चट्टान पर स्थित। इसी तरह मंडोर, सिवाना और जालौर दुर्ग भी अरावली की अवशिष्ट एवं दक्षिण-पश्चिमी श्रेणियों पर स्थित है। जो ठोस ग्रेनाइट और प्राकृतिक पहाड़ियों का उपयोग कर बनाए गए। इनमें पर्वतमाला को संरक्षण की संस्कृति को अपनाया गया।
अन्य प्रमुख किले जो अरावली पर्वतमाला पर स्थित है
आठवीं सदी में बनवाया गया अजमेर का तारागढ़ दुर्ग, 12 वीं सदी में निर्मित भीलवाड़ा का मांडलगढ़ दुर्ग और अलवर में 15 वीं सदी में बना बाला किला भी अरावली पहाड़ी को काटे बिना बनवाए गए थे। पहाड़ी की प्राकृतिक रेखाओं पर ही इनका निर्माण कराया गया।

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