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अरावली की रिचर्ड मर्फी की सौ मीटर वाली परिभाषा अपूर्ण, अप्रचलित

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अरावली की रिचर्ड मर्फी की सौ मीटर वाली परिभाषा अपूर्ण, अप्रचलित

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उदयपुर से आगे बढ़ी थी परिभाषा, अब उदयपुर ने ही इस को गलत ठहराया
उदयपुर, 28 दिसंबर:
अरावली पर्वतमाला को परिभाषित करने वाली रिचर्ड मर्फी की विवादित 100 मीटर ऊंचाई आधारित परिभाषा, जो वर्ष 2002 में उदयपुर से ही सामने आई थी, अब उसी उदयपुर के विद्वानों और विशेषज्ञों ने खारिज कर दी है। भूवैज्ञानिकों, भूगोलविदों और तकनीकविदों का कहना है कि यह परिभाषा अनुमान आधारित, अपूर्ण और अरावली जैसी प्राचीन व विशिष्ट पर्वत श्रृंखला के लिए पूरी तरह अनुपयोगी है।
प्रकृति रिसर्च संस्थान, इंस्टीट्यूट ऑफ टाउन प्लानर्स इंडिया, लक्षप्रा फाउंडेशन और इंटैक के संयुक्त तत्वावधान में रविवार को आयोजित अरावली पहाड़ संरक्षण पर राष्ट्रीय सेमिनार में इस परिभाषा पर विस्तार से चर्चा हुई। संगोष्ठी में पर्यावरण मंत्रालय द्वारा पूरी अरावली श्रृंखला को एक निरंतर भूवैज्ञानिक भू-आकृति मानते हुए पारिस्थितिकीय संरक्षण की घोषणा का स्वागत किया गया। विशेषज्ञों ने विश्वास जताया कि इससे लंबे समय से चले आ रहे विवाद और असमंजस का समाधान संभव होगा।
वैज्ञानिक आधार पर उठे सवाल
सुखाड़िया विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभाग के पूर्व प्रो. डॉ. विनोद अग्रवाल, भूगोल विभाग के पूर्व प्रो. डॉ. पी.आर. व्यास, वर्तमान विभागाध्यक्ष प्रो. सीमा जालान और विद्या भवन पॉलिटेक्निक के प्राचार्य डॉ. अनिल मेहता ने बताया कि रिचर्ड मर्फी की 1968 की परिभाषा, 1954 के हेमंड लैंडफॉर्म क्लासिफिकेशन पर आधारित है। यह परिभाषा ऊंचाई, भूवैज्ञानिक आयु और क्षरण जैसे सीमित मापदंडों पर टिकी है, जो अरावली और हिमालय जैसी विशिष्ट पर्वतमालाओं पर सीधे लागू नहीं की जा सकती।
आधुनिक तकनीक के दौर में पुराना पैमाना
प्रकृति रिसर्च संस्थान के अध्यक्ष प्रो. पी.आर. व्यास और इंस्टीट्यूशन ऑफ टाउन प्लानर्स इंडिया के क्षेत्रीय सदस्य व पूर्व अतिरिक्त मुख्य नगर नियोजक सतीश श्रीमाली ने कहा कि केवल ऊंचाई को आधार बनाना आज के जियो-स्पेशियल, रिमोट सेंसिंग और जीआईएस तकनीक के युग में आश्चर्यजनक है। ढलान, भू-संरचना और भूवैज्ञानिक आयु जैसे महत्वपूर्ण तत्वों की अनदेखी वैज्ञानिक दृष्टि से गलत है।
उदयपुर में स्थापित किया जाए ‘अरावली शोध संस्थान’
मुख्य अतिथि पूर्व वरिष्ठ नगर नियोजक बी.एस. कानावत ने रिसॉर्ट और अन्य निर्माणों के लिए पहाड़ियों की कटाई पर चिंता जताई और अरावली को आहड़ सभ्यता से जुड़ा महत्वपूर्ण जियो-हेरिटेज बताया। अध्यक्षीय उद्बोधन में इंटैक के पूर्व कन्वीनर व पूर्व कुलपति प्रो. बी.पी. भटनागर ने खनन को पर्यावरण-अनुकूल बनाने और परित्यक्त खदानों के वैज्ञानिक पुनर्वास पर जोर दिया। सेमिनार में उदयपुर में अरावली शोध संस्थान की स्थापना की मांग उठी, ताकि इसके सामाजिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, पुरातात्त्विक, पारिस्थितिक और पर्यावरणीय महत्व पर समग्र अध्ययन हो सके। विशेषज्ञों ने एक स्वर में 100 मीटर के प्रावधान को वापस लेने और अरावली के समग्र संरक्षण की दिशा में ठोस कदम उठाने की आवश्यकता बताई।

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