दिव्य आनंद धाम के स्वामी अनंतराम शास्त्री ने सरल भाषा में समझाईं श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाएँ
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श्रद्धा, भक्ति और ज्ञान का संगम बना सभागार
भागवत में भगवान की लीलाओं से होता है जनोद्धार
श्रीमद्भागवत कथा में उमड़ा श्रद्धालुओं का जनसैलाब
उदयपुर, 28 दिसम्बर: शहर के शोभागपुरा स्थित शुभकेशर गार्डन में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के सातवें और आखिरी दिन रविवार को श्रद्धा, भक्ति और ज्ञान का अनुपम संगम बन गया। कथा का वाचक दिव्य आनंद धाम, रामद्वारा बड़ी सादड़ी के स्वामी श्री अनंतराम शास्त्री ने अपनी सरल, सहज और हृदयस्पर्शी वाणी से श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया। प्रतिदिन कथा स्थल पर महिला, पुरुष, वृद्ध और युवा श्रद्धालुओं ने बड़ी संख्या उपस्थित होकर धर्मलाभ प्राप्त किया।
आखिरी दिन रविवार के प्रारंभिक प्रसंगों में स्वामी अनंतराम शास्त्री ने प्रद्युम्न के जन्म की कथा सुनाते हुए बताया कि भगवान की प्रत्येक लीला लोक कल्याण और भक्तों के उद्धार के लिए होती है। इसके पश्चात स्यमंतक मणि प्रसंग के माध्यम से उन्होंने सत्य, न्याय और निष्कपट आचरण का महत्व विस्तार से समझाया।
भौमासुर उद्धार एवं श्रीकृष्ण द्वारा 16100 राजकन्याओं से विवाह के प्रसंग में कथा वाचक स्वामी अनंतराम ने स्पष्ट किया कि यह लीला ऐश्वर्य प्रदर्शन नहीं, बल्कि पीड़ित नारियों को सम्मान, सुरक्षा और नया जीवन देने का संदेश है। इस मार्मिक वर्णन को सुनकर श्रद्धालु भावुक हो उठे।
कृष्ण–बाणासुर युद्ध का वर्णन करते हुए स्वामी श्री अनंतराम शास्त्री ने अहंकार के विनाश और भक्तों पर भगवान की असीम कृपा का महत्व समझाया। वहीं बलरामजी के ब्रजगमन और भगवान श्रीकृष्ण के इंद्रप्रस्थ गमन के प्रसंगों में उन्होंने बताया कि भगवान अपने भक्तों के सुख-दुःख में सदैव सहभागी रहते हैं।
राजसूय यज्ञ और उसमें दुर्योधन के अभिमान भंग के प्रसंग को स्वामीजी ने अत्यंत रोचक एवं शिक्षाप्रद ढंग से प्रस्तुत करते हुए कहा कि अहंकार व्यक्ति की बुद्धि को नष्ट कर देता है और वही उसके पतन का कारण बनता है।
कथा का विशेष आकर्षण श्रीकृष्ण–सुदामा मिलन प्रसंग रहा। द्वारका में सुदामा के स्वागत और उन्हें ऐश्वर्य की प्राप्ति का वर्णन करते समय स्वामी अनंतराम शास्त्री की वाणी में करुणा और प्रेम झलक उठा।
श्रीकृष्ण सांदीपनि आश्रम शिक्षा के दौरान अपने बचपन के परम मित्र गरीब साथी सुदामा को आदर सत्कार के साथ महल में लाए। हेमंत लड्ढा ने बताया कि इस दौरान श्रीकृष्ण के स्वरूप में सौरभ लड्ढा और रुक्मिणी के स्वरूप में उनकी पत्नी स्वाति लड्ढा मंच पर पधारे। जब गरीब सुदामा के स्वरूप में श्रीरतन मोहता ने लाठी लेकर सभागार में प्रवेश किया तो उनके जीवंत अभिनय पर श्रद्धालु जय जयकार करने लगे। माहौल भक्तिरस में हिचकोले ले रहा था जब कृष्ण रूपी सौरभ को पता चला कि सुदाम राजमहल के द्वार पर आए है तो कृष्ण दौड़ते हुए द्वार पर पहुंचे और सुदामा रूपी श्रीरतन को गले लगाकर महल में लाए। उनके पैर धोए। झांकी में तीनों पात्रों का जीवंत अभिनय श्रद्धालुओं को अन्तस से झकझोरते हुए भक्ति रस में भिगो गया। तीनों पात्रों का शृंगार और अभिनय इतना जीवंत था कि श्रद्धालु भक्ति भाव रूपी गंगा में गोते लगाते रहे। किसी के आंसू गाल पर ढुलक रहे थे तो कोई अश्रु पोंछ रहा था। इस दौरान बहुत देर तक जयकारों के बीच अथाह पुष्प वृष्टि होती रही। सभागार में चौतरफा पुष्पों की चादर बिछ गई। सच्ची मित्रता और निष्काम भक्ति भगवान को सर्वाधिक प्रिय होती है। इस प्रसंग की व्याख्या के दौरान कई श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं।
आगे सुभद्रा हरण, वेद स्तुति और शिवजी द्वारा संकट मोचन के प्रसंगों ने वातावरण को पूर्णतः भक्तिमय बना दिया। कथा के समापन चरण में राजा परीक्षित की परमगति का वर्णन करते हुए स्वामी श्री अनंतराम शास्त्री ने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण मात्र ही मनुष्य को जीवन का सच्चा मार्ग दिखाता है और मोक्ष की ओर अग्रसर करता है। यही कथा का विश्राम हुआ।
कथा स्थल पर “राधे-राधे”, “हरि बोल” और “जय श्रीकृष्ण” के जयघोष गूंजते थे। रविवार को कथा के दौरान गोभक्त साध्वी श्री कपिला सरस्वती भी मंच पर पधारे और कथावाचक स्वामी अनंतराम से आशीर्वाद लिया। उन्होंने अपने संक्षिप्त उद्बोधन में गाय की महिमा का वर्णन करते हुए संतों द्वारा आगामी गोवध विरोधी आंदोलन पर प्रकाश डाला एवं श्रद्धालुओं से उनके आगामी गोवध विरोधी अभियान की रूपरेखा समझाई। अंत में सभी सहयोगकर्ताओं का स्वामी अनंतराम ने उपरना ओढाकर अभिनंदन किया।
