LOADING

Type to search

जिला अस्पतालों को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी

Local

जिला अस्पतालों को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी

Share

पहले चरण में 750 बैड वाले जिला अस्पतालों को किया जाएगा शामिल
आधे बैड मार्केट बैड की तरह विकसित किए जाएंगे, जिनका मरीजों को निजी अस्पताल की तरह देना होगा शुल्क
आधे बैड पर सरकारी योजनाओं और सामान्य मरीजों की तरह सेवाएं रहेंगी जारी
सुभाष शर्मा
उदयपुर, 31 दिसम्बर:
केंद्र सरकार की योजना देश के जिला अस्पतालों को निजी अस्पतालों में देने की है। जिन्हें पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल के जरिए निजी क्षेत्र में सौंपा जाएगा। नीति आयोग ने इस संबंध में 250 पन्नों का एक विस्तृत दस्तावेज जारी किया है, जिस पर देशभर के स्टेकहोल्डर्स से सुझाव और प्रतिक्रियाएं मांगी गई हैं।
दस्तावेज के अनुसार पहले चरण में 750 बिस्तरों वाले जिला अस्पतालों को इस मॉडल में शामिल किया जाएगा। हालांकि फिलहाल राजस्थान में ऐसा कोई जिला अस्पताल नहीं है, जहां 750 बिस्तर हैं और उसकी किसी ना किसी मेडिकल कॉलेज से संबंद्धता नहीं। हालांकि नीति आयोग के दस्तावेज के मुताबिक संभाग स्तर के उन अस्पतालों को भी निजी क्षेत्र से जोड़ा जा सकता है, जो पहले से किसी ना किसी मेडिकल कॉलेज से जुड़े हैं। यदि ऐसा होता है तो उदयपुर का एमबी अस्पताल, अजमेर का जेएलएन अस्पताल, जोधपुर का एमडीएम अस्पताल और बीकानेर का पीबीएम अस्पताल भी इसी दायरे में शामिल हो जाएगा।
पीपीपी मोड के अस्पतालों के आधे बैड पर नहीं मिलेगी नि:शुल्क सुविधा
नीति आयोग के दस्तावेज में साफ जाहिर कर दिया कि जिन जिला अस्पताल या अन्य बड़े अस्पतालों को इस योजना में शामिल किया गया तो उसके आधे बैड तो सरकारी सुविधा और उन मरीजों को लिए उपलब्ध होंगे, जिनका उपचार नि:शुल्क होगा। जबकि आधे मरीजों का उपचार उसी तरह सशुल्क होगा, जिस तरह निजी अस्पतालों में मरीज देते आ रहे हैं।
नीति आयोग का मानना जिला अस्पतालों को पीपीपी मोड़ पर संचालित किया जाएगा तो वहां बेहतर सुविधाएं मिलेंगी। इस व्यवस्था से जिला अस्पतालों में आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं, बेहतर प्रबंधन और संसाधनों का प्रभावी उपयोग संभव हो सकेगा। निजी क्षेत्र की भागीदारी से इंफ्रास्ट्रक्चर, विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता और अत्याधुनिक उपकरणों में सुधार होगा, जिससे मरीजों को अपने ही जिले में बेहतर इलाज मिल सकेगा।
दस रुपए लिया जाएगा पंजीकरण शुल्क
दस्तावेज में इसका भी उल्लेख है कि जो अस्पताल उक्त दायरे में आएंगे, उनमें पंजीकरण फीस मात्र 10 रुपये रखी जाएगी, ताकि आम जनता पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ न पड़े। हालांकि अभी सभी सरकारी अस्पताल में मरीजों को किसी तरह शुल्क नहीं लिया जा रहा। मार्केट बैड पर इलाज कराने वाले मरीजों को निर्धारित शुल्क देना होगा, जो तय किया जाना बाकी है। नीति आयोग के मुताबिक इससे अस्पताल की आय बढ़ेगी और उसी राशि से अन्य सुविधाओं का विकास किया जाएगा।
मिली—जुली प्रतिक्रियाएं आईं सामने
नीति आयोग के प्रस्ताव को लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. आशीष शर्मा का मानना है कि निजी भागीदारी से सरकारी अस्पतालों की हालत सुधरेगी और मरीजों को बेहतर सेवाएं मिलेंगी। वहीं, ज्यादातर संगठनों और मरीजों का कहना है कि इससे गरीब और मध्यम वर्ग के मरीजों पर अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक दबाव बढ़ सकता है तथा सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की मूल भावना प्रभावित हो सकती है।
सुझाव और आपत्तियां मांगी, अंतिम निर्णय इसके बाद
नीति आयोग ने स्पष्ट किया है कि सभी सुझावों और आपत्तियों पर विचार करने के बाद ही अंतिम निर्णय लिया जाएगा। राज्यों की सहमति और स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए इस मॉडल को लागू किया जाएगा। केंद्र सरकार का दावा है कि इस पहल का उद्देश्य स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण नहीं, बल्कि गुणवत्ता और पहुंच में सुधार करना है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *