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लोक कलाओं को ‘इवेंट’ नहीं, निरंतर सांस्कृतिक प्रक्रिया बनाया: फुरकान खान

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लोक कलाओं को ‘इवेंट’ नहीं, निरंतर सांस्कृतिक प्रक्रिया बनाया: फुरकान खान

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साक्षात्कार : संस्कृति केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य की मजबूत बुनियाद
पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के निदेशक से विशेष बातचीत
सुभाष शर्मा

उदयपुर, 1 जनवरी: देश में लोक कला और पारंपरिक सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को प्रायः मेलों और उत्सवों तक सीमित समझा जाता रहा है, लेकिन पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, उदयपुर के निदेशक फुरकान खान ने इस सोच को नई दिशा दी है। उन्होंने लोक कलाओं को केवल संरक्षण तक सीमित न रखते हुए उन्हें राष्ट्रीय सांस्कृतिक विमर्श का अभिन्न हिस्सा बनाया। उनसे हुई यह विशेष बातचीत इस बात को स्पष्ट करती है कि संस्कृति केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य की मजबूत बुनियाद भी है।
फुरकान खान कहते हैं कि उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता लोक कला को “इवेंट आधारित” दृष्टिकोण से बाहर निकालना रही। उनके अनुसार लोक कलाएं जीवंत परंपराएं हैं, जिन्हें निरंतर अभ्यास, संवाद और प्रस्तुति की आवश्यकता होती है। इसी सोच के तहत उन्होंने कलाकार, दर्शक और युवाओं—तीनों को एक साझा सांस्कृतिक धारा से जोड़ने का प्रयास किया।
लोकनाट्य और संगीत के क्षेत्र में ठोस हस्तक्षेप करते हुए उन्होंने जयपुर के तमाशा लोकनाट्य, नड़ वादन, रावणहत्था और अलगोजा जैसी परंपरागत कलाओं पर विशेष कार्य किया। फुरकान खान बताते हैं कि ये कलाएं आज भी जीवित हैं, लेकिन इन्हें मंच और निरंतरता की जरूरत थी। केंद्र के माध्यम से इन परंपराओं के लिए प्रशिक्षण, दस्तावेजीकरण और नियमित प्रस्तुतियों की व्यवस्था की गई। यह पहली बार हुआ जब इन कलाओं को केवल उत्सवों तक सीमित न रखकर नियमित सांस्कृतिक कार्यक्रमों का हिस्सा बनाया गया।
शिल्पग्राम को लेकर उनकी सोच भी पारंपरिक ढांचे से अलग रही। उनका मानना है कि आज का दर्शक केवल देखने नहीं, बल्कि अनुभव करने आता है। इसी विचार के साथ गोवा की टेराकोटा कला, राजस्थान की पत्थर शिल्प परंपरा और जनजातीय लकड़ी शिल्प को स्थायी स्वरूप दिया गया। पत्थर से बनी पारंपरिक आकृतियां आज शिल्पग्राम की पहचान बन चुकी हैं और सोशल मीडिया के माध्यम से स्वतः प्रचार का माध्यम भी बन रही हैं।
फुरकान खान ने गुरु–शिष्य परंपरा को पुनर्जीवित करने पर विशेष जोर दिया। वे कहते हैं कि यह परंपरा हमारी सांस्कृतिक रीढ़ है। इसे औपचारिक और व्यावहारिक स्वरूप देने के लिए मानदेय आधारित प्रशिक्षण, निश्चित अवधि और प्रस्तुति मंच की व्यवस्था की गई, ताकि पारंपरिक ज्ञान व्यवस्थित रूप से अगली पीढ़ी तक पहुंच सके।
जनजातीय और सीमांत कलाओं को मुख्यधारा से जोड़ना भी उनके कार्यकाल की अहम उपलब्धि रही। भील–गरासिया नृत्य, गोंड और वारली चित्रकला तथा सिद्धि समुदाय की सांस्कृतिक परंपराओं को राष्ट्रीय मंच दिलाया गया। उनका मानना है कि इससे न केवल कलाकारों का आत्मविश्वास बढ़ा, बल्कि इन परंपराओं को देश और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली।
युवाओं की भूमिका को लेकर फुरकान खान साफ कहते हैं कि युवाओं के बिना लोक कला का भविष्य संभव नहीं। इसी कारण स्कूल–कॉलेज कार्यशालाएं, युवा कलाकार मंच और स्वयंसेवी सहभागिता को केंद्र की नीतियों का हिस्सा बनाया गया। युवाओं की भागीदारी से परंपराओं में नई ऊर्जा और नए विचार जुड़े हैं।
दो गुना पर्यटकों का देखा था सपना, इस बार पूरा हो गया
अंत में वे कहते हैं, “कला और संस्कृति पर बहुत कुछ कहा और लिखा जा सकता है, लेकिन अगर आज लोग लोक कला को केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि निरंतर सांस्कृतिक प्रक्रिया के रूप में देखने लगे हैं, तो यही मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है।” वह बताते हैं कि जब उन्होंने 2013 में पहली बार निदेशक के रूप में पदभार ग्रहण किया, तब शिल्पग्राम में पर्यटकों की संख्या 93 हजार थी। उस समय इसे दोगुना करने का एक सपना देखा गया था। आज यह सपना साकार हो चुका है। इस वर्ष शिल्पग्राम उत्सव में कुल 1 लाख 88 हजार 735 पर्यटक पहुंचे, जो शिल्पग्राम की बढ़ती लोकप्रियता और सांस्कृतिक पहचान को दर्शाता है।

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