फिल्म निर्माता विक्रम भट्ट को हाईकोर्ट से झटका
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एफआईआर रद्द करने से इनकार, याचिका खारिज
उदयपुर, 5 दिसम्बर: राजस्थान हाईकोर्ट ने फिल्म निर्माण से जुड़े करोड़ों रुपए के कथित गबन और धोखाधड़ी मामले में अहम फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति समीर जैन ने फिल्म निर्माता विक्रम भट्ट और उसके साथियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने से साफ इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया गंभीर आपराधिक आरोप बनते हैं, और मामले में विस्तृत जांच जरूरी है।
उदयपुर के भूपालपुरा निवासी डॉ. अजय मुर्डिया ने विक्रम भट्ट, श्वेतांबरी भट्ट और अन्य के खिलाफ धोखाधड़ी और अमानत में खयानत का मामला दर्ज कराया था। आरोप है कि फिल्म प्रोजेक्ट के नाम पर लिए गए फंड का गबन किया गया है। याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि विक्रम भट्ट प्रतिष्ठित फिल्म निर्माता हैं। शिकायतकर्ता के साथ उनका 40 करोड़ और बाद में 7 करोड़ रुपए के निवेश का करार हुआ था। याचिकाकर्ता के वकील ने बताया कि दोनों में हुए करार के तहत चार में से एक फिल्म पूरी हो चुकी है, लेकिन शिकायतकर्ता ने फाइनेंस रोक दिया। वकील ने तर्क दिया कि यह दो पक्षों के बीच का अनुबंध उल्लंघन का मामला है, जो सिविल प्रकृति का है। वकील ने कहा कि एग्रीमेंट के मुताबिक विवाद का क्षेत्राधिकार मुंबई होना चाहिए था, न कि उदयपुर।
यह सिर्फ कॉन्ट्रैक्ट का उल्लंघन नहीं: कोर्ट
सरकारी वकील और शिकायतकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया कि पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच की थी, जिसमें पैसों के गबन की पुष्टि हुई है। कोर्ट ने मामले में दखल देने से इनकार करते हुए कहा कि रिकॉर्ड से पता चलता है कि 2.50 करोड़ रुपए की पहली किस्त ही अन्य खातों में डायवर्ट कर दी गई। कोर्ट ने फैसले में लिखा कि आरोप केवल अनुबंध के पालन न करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसमें फंड का जानबूझकर डायवर्जन, पारदर्शिता की कमी और बेईमानी का तत्व शामिल है। प्रारंभिक जांच में फर्जी इनवॉयस और पैसों को घुमाने के सबूत मिले हैं।
बॉम्बे हाईकोर्ट से भी नहीं मिली थी राहत
सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि विक्रम भट्ट और अन्य आरोपियों की अग्रिम जमानत याचिका बॉम्बे हाईकोर्ट पहले ही खारिज कर चुका है। कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ताओं ने कुछ तथ्य छिपाए हैं। पुलिस जांच में सामने आया कि फिल्म निर्माण के लिए दिया गया पैसा वेंडर्स और ऐसे लोगों को ट्रांसफर किया गया, जिनका फिल्म से कोई लेना-देना नहीं था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब किसी मामले में प्रथमदृष्टया संज्ञेय अपराध बनता हो तो हाईकोर्ट को जांच में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
