रेती–पत्थर की धरपकड़ से ठिठका कंस्ट्रक्शन बाजार, थमते दिखे निर्माण कार्य
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अरावली बचाओ अभियान का साइड इफैक्ट, भाव डेढ़ गुना बढ़े, आम आदमी का बजट बिगड़ा
कौशल मूंदड़ा
उदयपुर, 6 जनवरी: अरावली बचाओ अभियान के तहत रेती और पत्थर के अवैध परिवहन पर प्रशासन की सख्त कार्रवाई ने उदयपुर जिले के कंस्ट्रक्शन बाजार की रफ्तार पर अचानक ब्रेक लगा दिया है। ट्रैक्टर और डंपर पर हो रही लगातार धरपकड़ के चलते निजी ही नहीं, बल्कि सरकारी निर्माण कार्य भी प्रभावित होने लगे हैं। सबसे ज्यादा असर आम आदमी के उस निर्माण पर पड़ा है, जिसमें उसने वर्षों की जमा पूंजी लगाकर अपने सपनों का आशियाना खड़ा करना शुरू किया था। हालात ऐसे बन गए हैं कि कई निर्माण पूरी तरह ठहर गए हैं, तो कई जगह काम की रफ्तार बेहद धीमी हो गई है।
लोकल रेती पर रोक, पत्थर की सीधी ‘ना’
निर्माण से जुड़े लोगों के सामने सबसे बड़ी समस्या पत्थर और लोकल रेती की उपलब्धता को लेकर खड़ी हो गई है। सराड़ा, सल्लाड़ा, खरका और कुराबड़ क्षेत्र से आने वाली लोकल रेती पर रोक के बाद परिवहन लगभग थम गया है। रात के अंधेरे में जो सीमित सप्लाई हो भी रही है, वह हर समय कार्रवाई की आशंका में घिरी हुई है। पत्थर की स्थिति तो और भी खराब है, जहां सप्लाई लगभग बंद होने जैसी है।
गुजरात की रेती और एम-सेंड बना सहारा, लेकिन महंगा
मजबूरी में जिन लोगों को निर्माण जारी रखना है, वे गुजरात से आने वाली रेती और एम-सेंड पर निर्भर हो गए हैं। इसका सीधा असर कीमतों पर पड़ा है। गुजरात की रेती के भाव, जो पहले 900–950 रुपए प्रति टन थे, अब बढ़कर 1100–1200 रुपए प्रति टन तक पहुंच गए हैं। पुराने स्टॉक पर भी बढ़े हुए दाम वसूले जा रहे हैं।
वहीं पत्थर को क्रश कर तैयार की जाने वाली एम-सेंड की मांग अचानक बढ़ गई है। इसके भाव भी 600–700 रुपए से बढ़कर 900–1000 रुपए प्रति टन हो गए हैं। हालांकि एम-सेंड चिनाई में तो काम आ रही है, लेकिन प्लास्टर के लिए इसे उपयुक्त नहीं माना जा रहा।
भारी चालान का डर, सप्लाई चेन प्रभावित
जानकारों के अनुसार रेती के एक ट्रैक्टर पर एक लाख रुपए से अधिक और एक डंपर पर दो लाख रुपए से अधिक का चालान हो रहा है। इसी डर के चलते इस काम से जुड़े कई लोगों ने फिलहाल हाथ खड़े कर दिए हैं। लोकल स्टॉक पर प्रशासन की नजर होने से व्यापारी और ठेकेदार असमंजस में हैं और ‘वेट एंड वॉच’ की नीति अपनाने की सलाह दे रहे हैं।
निर्माण के डिजाइन भी बदलने पर मजबूरी
पत्थर की भारी कमी के चलते कुछ लोग लोड बेयरिंग की जगह कॉलम स्ट्रक्चर की योजना पर विचार कर रहे हैं, लेकिन इससे भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल पा रहा है। पत्थर की जरूरत किसी न किसी स्तर पर बनी ही रहती है।
पुराने घरों के मलबे की बढ़ी कीमत
पत्थरों की किल्लत का असर अब पुराने घरों के रिनोवेशन तक दिखने लगा है। निर्माण ठेकेदारों का कहना है कि पुराने पत्थर-चूने की चिनाई वाले मकानों के मलबे से निकलने वाले पत्थर अब काम में लिए जा रहे हैं या छोटी जरूरत वालों को बेचे जा रहे हैं। हालात यह हैं कि मलबा भी अब कीमती संसाधन बन गया है।
आम आदमी पर सीधी मार
बाजार में चर्चा है कि प्रशासन और उद्योग के बीच कोई मध्य मार्ग जरूर निकलेगा, लेकिन तब तक अरावली बचाने की मुहिम की मार सीधे आम आदमी के बजट पर पड़ती दिख रही है। लोग यह कहने से भी नहीं चूक रहे कि जुगाड़ की सीमाएं आम आदमी के लिए तय हैं—काम रुकेगा तो उसी का, खास आदमी का नहीं।
