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वन उपज से खुल रही समृद्धि की राह

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वन उपज से खुल रही समृद्धि की राह

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औषधीय उत्पादों के संग्रहण से राजस्थान में 70 करोड़ से अधिक का कारोबार, आदिवासी अंचलों में बढ़ी आजीविका
उदयपुर, 21 अप्रैल:
राजस्थान के जंगल अब केवल हरियाली का प्रतीक नहीं रहे, बल्कि ग्रामीण और वनवासी परिवारों के लिए आर्थिक समृद्धि के मजबूत आधार बनते जा रहे हैं। राज्य के वनों से प्राप्त लघु एवं औषधीय वन उपज ने हजारों परिवारों की आजीविका को नई दिशा दी है। वन विभाग के ताजा आंकड़ों के अनुसार राजस्थान में लघु वन उपज (एनटीएफपी) से प्रतिवर्ष करीब 52 करोड़ रुपये का प्रत्यक्ष राजस्व प्राप्त हो रहा है, जबकि संग्रहण, मजदूरी और बाजार मूल्य को मिलाकर इसका कुल आर्थिक मूल्य 70 करोड़ रुपये से अधिक पहुंच गया है। यह बढ़ती आय राज्य के आदिवासी और वन क्षेत्रों में आर्थिक बदलाव की नई तस्वीर पेश कर रही है।
वन विभाग के अनुसार गोंद, शहद, आंवला, गिलोय, अश्वगंधा, हरड़, बहेड़ा और बेलपत्र जैसे औषधीय उत्पादों की बाजार में लगातार मांग बढ़ रही है। उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर और प्रतापगढ़ जैसे आदिवासी बहुल जिलों में इन वन उत्पादों के संग्रहण से हजारों परिवारों को अतिरिक्त आमदनी मिल रही है। यही वजह है कि वन उपज अब ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा बनती जा रही है।
राज्य सरकार की आर्थिक समीक्षा रिपोर्ट में भी लघु वन उपज को ग्रामीण रोजगार और पंचायत राज संस्थाओं की आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बताया गया है। औषधीय पौधों के संरक्षण और वैज्ञानिक दोहन के लिए विशेष क्षेत्र विकसित किए जा रहे हैं, जिससे वन संपदा का संरक्षण भी हो और ग्रामीणों की आय भी बढ़े।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैज्ञानिक संग्रहण, प्रोसेसिंग और सीधी मार्केटिंग को और मजबूत किया जाए, तो वन उपज आधारित कारोबार कई गुना बढ़ सकता है। खासकर आयुर्वेद और खाद्य उद्योग में बढ़ती मांग के चलते राजस्थान की वन संपदा आने वाले समय में ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन सकती है। यह पहल वन संरक्षण के साथ-साथ रोजगार और राजस्व दोनों बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रही है।

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