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स्वर्णप्रभा सत्रांत समारोह में गूँजा संदेश — “एआई के युग में मानवता को बचाए रखना शिक्षक की सबसे बड़ी भूमिका” : डॉ. प्रदीप कुमावत

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स्वर्णप्रभा सत्रांत समारोह में गूँजा संदेश — “एआई के युग में मानवता को बचाए रखना शिक्षक की सबसे बड़ी भूमिका” : डॉ. प्रदीप कुमावत

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उदयपुर 16 मई: आलोक संस्थान के स्वर्णिम मूल्यों, व्यक्ति निर्माण की परंपरा और आधुनिक शिक्षा के समन्वय को समर्पित “स्वर्णप्रभा सत्रांत समारोह” का आयोजन आलोक संस्थान के व्यास सभागार में गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। मुख्य अतिथि आलोक संस्थान के निदेशक डॉ प्रदीप कुमावत थे। समारोह में संस्थान की विभिन्न शाखाओं के अध्यापकगण, प्राचार्य एवं शिक्षा से जुड़े अनेक गणमान्यजन उपस्थित रहे।
समारोह को संबोधित करते हुए आलोक संस्थान के निदेशक डॉ. प्रदीप कुमावत ने वर्तमान समय में शिक्षा के बदलते स्वरूप, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बढ़ती भूमिका और शिक्षक की महत्ता पर अत्यंत प्रेरक एवं चिंतनशील उद्बोधन दिया।
उन्होंने कहा कि आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने शिक्षा प्रणाली, समाज की सोच और जीवनशैली तक को बदलकर रख दिया है। मोबाइल, इंटरनेट और डिजिटल माध्यमों ने बच्चों के सामने सूचनाओं का अथाह भंडार खोल दिया है लेकिन केवल सूचना ही शिक्षा नहीं होती। शिक्षा वह है जो मनुष्य को संवेदनशील, संस्कारी और उत्तरदायी बनाती है।
डॉ. कुमावत ने कहा कि आने वाले समय में सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं होगी कि बच्चों को कितना ज्ञान मिला, बल्कि यह होगी कि क्या वे मानवीय मूल्यों को बचाए रख पाए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस गणना कर सकता है, जानकारी दे सकता है लेकिन संवेदना, करुणा, संस्कार और मानवता केवल शिक्षक ही दे सकता है।”
डॉ कुमावत ने कहा कि राजनीति, संसद और लोकसभाएँ नीतियाँ बना सकती हैं, लेकिन भारत के भविष्य का वास्तविक निर्माण कक्षाओं में होता है। शिक्षक ही वह शक्ति है जो किसी बच्चे को केवल सफल नहीं बल्कि श्रेष्ठ नागरिक बना सकता है।
समारोह में उन्होंने अध्यापकों से आह्वान किया कि वे स्वयं को केवल विषय पढ़ाने वाला कर्मचारी न समझें बल्कि राष्ट्र निर्माण का साधक मानें। उन्होंने कहा कि आज बच्चों को तकनीक के साथ-साथ नैतिकता, अनुशासन, पारिवारिक संस्कार, भारतीय संस्कृति और सामाजिक संवेदनशीलता सिखाना भी आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि यदि शिक्षा केवल अंकों और प्रतियोगिता तक सीमित रह गई तो समाज में कुशल लोग तो होंगे, लेकिन चरित्रवान मनुष्य कम होते जाएंगे। इसलिए विद्यालयों को आधुनिक तकनीक अपनाने के साथ-साथ गुरु-शिष्य परंपरा और मानवीय मूल्यों को भी सशक्त बनाए रखना होगा।
उन्होंने ब्लैक बोर्ड और चॉक की प्रतीकात्मक महत्ता का उल्लेख करते हुए कहा कि तकनीक कितनी भी विकसित हो जाए, शिक्षक की भूमिका कभी समाप्त नहीं हो सकती। शिक्षक का स्पर्श, उसकी प्रेरणा और उसका मार्गदर्शन किसी मशीन से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता।
समारोह के दौरान आगामी शैक्षणिक सत्र, प्रवेश अभियान और आलोक संस्थान हिरण मगरी शाखा के स्वर्णिम 50 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों पर भी चर्चा की गई। अध्यापकों को विभिन्न समितियों के माध्यम से संस्थान की स्वर्णिम यात्रा से सक्रिय रूप से जोड़ने का आह्वान किया गया।
कार्यक्रम में संस्थान की उपलब्धियों, विद्यार्थियों की सफलताओं एवं शिक्षकों के योगदान का भी उल्लेख किया गया। पूरे सभागार में उत्साह, आत्मीयता और भविष्य के प्रति सकारात्मक संकल्प का वातावरण दिखाई दिया।
समारोह के अंत में यह संकल्प व्यक्त किया गया कि आलोक संस्थान आने वाले समय में आधुनिक शिक्षा, तकनीक और भारतीय संस्कारों के संतुलन के साथ ऐसी पीढ़ी तैयार करेगा जो केवल बुद्धिमान ही नहीं, बल्कि संवेदनशील, संस्कारी और राष्ट्रनिष्ठ भी होगी।
कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान एवं वंदे मातरम् के साथ हुआ।
स्वागत उद्बोधन आलोक हिरण मगरी प्राचार्य शशांक टांक ने दिया। धन्यवाद आलोक प्रशासक प्रतीक कुमावत ने दिया। इस अवसर पर आलोक फतेहपुरा प्रशासक निश्चय कुमावत, प्राचार्य वीरेंद्र पालीवाल, आलोक किड्स की प्रशासक निहारिका कुमावत, आलोक पंचवटी की प्रधानाध्यापिका डॉ संगीता भारद्वाज, आलोक नेचर स्कूल की प्रधानाध्यापिका वंदना त्रिवेदी सहित गण मान्य उपस्थित थे।

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