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“सड़कों पर बढ़ता ख़ौफ़ : क्या इंसानी जान से बड़ा हो गया कुत्तों का संकट?”

Opinion

“सड़कों पर बढ़ता ख़ौफ़ : क्या इंसानी जान से बड़ा हो गया कुत्तों का संकट?”

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सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी ने खड़े किए कई असहज सवाल

  • सत्य भूषण शर्मा, उदयपुर (राजस्थान)

भारत की संस्कृति करुणा, सह-अस्तित्व और जीव-दया की परंपरा से समृद्ध रही है। पशु-पक्षियों के प्रति प्रेम और संवेदनशीलता हमारी सामाजिक पहचान का अभिन्न हिस्सा हैं। किंतु जब यही संवेदनशीलता आम नागरिकों की सुरक्षा और जीवन के अधिकार के सामने चुनौती बनकर खड़ी हो जाए, तब समाज, प्रशासन और नीति-निर्माताओं को गंभीर आत्ममंथन करना पड़ता है। आज देश में आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या और उनके हमलों से उत्पन्न संकट इसी प्रकार की चुनौती बन चुका है।

देश के अनेक शहरों, कस्बों और गांवों में आम नागरिक भय और असुरक्षा के वातावरण में जीवन जीने को मजबूर हैं। सुबह की सैर पर निकले वरिष्ठ नागरिक, स्कूल जाने वाले मासूम बच्चे, साइकिल और मोटरसाइकिल सवार युवा तथा देर रात घर लौटने वाले कर्मचारी अक्सर कुत्तों के झुंडों के हमलों का सामना करते हैं। कई घटनाओं में लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं, जबकि कुछ मामलों में बच्चों और बुजुर्गों की जान तक चली गई है। ऐसे हादसे केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि परिवारों को आजीवन पीड़ा और मानसिक आघात दे जाते हैं।

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय पर चिंता व्यक्त करते हुए स्पष्ट किया कि मानव जीवन की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। न्यायालय की टिप्पणी केवल एक कानूनी टिप्पणी नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था के लिए चेतावनी और समाज के लिए संदेश है। अदालत ने संकेत दिया है कि यदि किसी क्षेत्र में कुत्तों का आतंक नागरिकों के जीवन और सुरक्षा के लिए खतरा बन रहा है, तो स्थानीय प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।

वास्तविकता यह है कि वर्षों से यह समस्या धीरे-धीरे विकराल रूप लेती रही, लेकिन समाधान के नाम पर अधिकांश स्थानों पर केवल औपचारिकताएं निभाई गईं। नसबंदी कार्यक्रम अपेक्षित गति से नहीं चले, टीकाकरण अभियान सीमित रहे और नगर निकायों ने कचरा प्रबंधन जैसी मूलभूत जिम्मेदारियों की भी उपेक्षा की। परिणामस्वरूप शहरों में खुले कचरे के ढेर आवारा कुत्तों के लिए भोजन और आश्रय का स्थायी स्रोत बन गए।

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी क्षेत्र में आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या का सीधा संबंध वहां की स्वच्छता व्यवस्था से होता है। जहां भोजन आसानी से उपलब्ध होगा, वहां कुत्तों की आबादी तेजी से बढ़ेगी। दुर्भाग्यवश हमारे अधिकांश नगरों में यही स्थिति देखने को मिलती है। कचरा समय पर नहीं उठता, गंदगी फैली रहती है और कुत्तों के झुंड सार्वजनिक स्थानों पर स्थायी रूप से डेरा जमा लेते हैं।

एक और चिंताजनक पहलू पालतू कुत्तों से जुड़ा है। विदेशी नस्लों के आक्रामक कुत्ते पालना आज कई लोगों के लिए प्रतिष्ठा और फैशन का विषय बन गया है। लेकिन हर व्यक्ति उनके प्रशिक्षण, नियंत्रण और सामाजिक व्यवहार की जिम्मेदारी नहीं निभाता। परिणामस्वरूप कई बार ये पालतू कुत्ते भी राह चलते लोगों पर हमला कर देते हैं। ऐसी घटनाएं यह प्रश्न उठाती हैं कि क्या केवल पशु पालने का अधिकार पर्याप्त है, या उसके साथ जिम्मेदारी और जवाबदेही भी अनिवार्य होनी चाहिए?

निस्संदेह पशु प्रेमी संगठनों की भावनाएं सम्माननीय हैं। किसी भी जीव के साथ क्रूरता सभ्य समाज की पहचान नहीं हो सकती। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि मानव जीवन और नागरिक सुरक्षा को नजरअंदाज कर कोई भी व्यवस्था लंबे समय तक टिक नहीं सकती। पशु अधिकार और मानव अधिकार परस्पर विरोधी नहीं हैं; आवश्यकता दोनों के बीच संतुलन स्थापित करने की है।

इस समस्या का एक गंभीर स्वास्थ्य पक्ष भी है। रेबीज आज भी भारत के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। कुत्तों के काटने के बाद समय पर उपचार नहीं मिलने पर यह बीमारी जानलेवा सिद्ध होती है। ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में जागरूकता तथा स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण स्थिति और अधिक गंभीर हो जाती है। इसलिए समाधान केवल संख्या नियंत्रण तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि व्यापक टीकाकरण, स्वास्थ्य जागरूकता और त्वरित चिकित्सा सुविधाओं को भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

समस्या का स्थायी समाधान बहुआयामी दृष्टिकोण से ही संभव है। नगर निकायों को स्वच्छता व्यवस्था में सुधार करना होगा। खुले कचरे के ढेर समाप्त करने होंगे। बड़े पैमाने पर नसबंदी और टीकाकरण कार्यक्रमों को मिशन मोड में चलाना होगा। प्रत्येक शहर में आधुनिक पशु पुनर्वास केंद्र स्थापित किए जाने चाहिए, जहां हिंसक, बीमार अथवा अनियंत्रित कुत्तों को सुरक्षित रखा जा सके। साथ ही विद्यालयों और सार्वजनिक संस्थानों में लोगों को कुत्तों के व्यवहार, बचाव के उपायों तथा प्राथमिक उपचार की जानकारी भी दी जानी चाहिए।

केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर एक ऐसी राष्ट्रीय नीति तैयार करनी चाहिए, जिसमें पशु कल्याण और मानव सुरक्षा दोनों को समान महत्व मिले। यह समस्या भावनात्मक बहसों से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सोच, प्रशासनिक इच्छाशक्ति और सामाजिक सहयोग से हल होगी।

आज आवश्यकता न तो अंधे पशु-प्रेम की है और न ही अमानवीय कठोरता की। आवश्यकता है विवेकपूर्ण, संतुलित और व्यावहारिक दृष्टिकोण की। नागरिकों को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। सार्वजनिक स्थानों पर स्वच्छता बनाए रखना, पालतू पशुओं के प्रति जिम्मेदार व्यवहार करना और प्रशासन को सहयोग देना सामाजिक कर्तव्य है।

सुप्रीम कोर्ट की हालिया सख्ती ने देश को एक स्पष्ट संदेश दिया है—संवेदनाएं महत्वपूर्ण हैं, लेकिन नागरिकों की सुरक्षा सर्वोपरि है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट भविष्य में और भयावह रूप ले सकता है। सुरक्षित समाज, स्वच्छ वातावरण और मानवीय संवेदनाओं के संतुलन के लिए अब निर्णायक कार्रवाई का समय आ गया है।

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