किसान किस्मों को कानूनी पहचान दिलाने में राजस्थान पीछे
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देश में 10,996 किसान-किस्म आवेदन, 952 पंजीकृत; 2026 तक 10,802 पौधा किस्म प्रमाणपत्र, राजस्थान की हिस्सेदारी महज 80
उदयपुर, 30 अगस्त (सुभाष शर्मा): खेतों में पीढ़ियों से संरक्षित बीज राजस्थान की कृषि विरासत का हिस्सा हैं, लेकिन इन पारंपरिक किस्मों को कानूनी पहचान दिलाने में प्रदेश की हिस्सेदारी बेहद कम है। पौधा किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण (PPV&FRA) के आंकड़ों के अनुसार देश में अगस्त 2020 तक किसानों और किसान समुदायों से 10,996 किसान-किस्म आवेदन प्राप्त हुए थे, जिनमें 952 किसान किस्में पंजीकृत हुईं। वहीं 31 जुलाई 2026 तक विभिन्न श्रेणियों में 10,802 पौधा किस्म पंजीकरण प्रमाणपत्र जारी किए जा चुके हैं। इनमें राजस्थान से महज 80 किस्में शामिल हैं। राजस्थान की कृषि विविधता को देखते हुए यह संख्या राज्य में किसान किस्मों के दस्तावेजीकरण और पंजीकरण की धीमी रफ्तार की ओर संकेत करती है।
मक्का, अरहर से गेहूं तक दर्ज हैं स्थानीय किस्में
प्राधिकरण के रिकॉर्ड में उदयपुर जिले के झाड़ोल-कुंभलगढ़ क्षेत्र की सोम पंचायत से जुड़ी मक्का की किसान किस्म ‘मालन’ और अरहर की ‘व्हाइट तुआरा’ का उल्लेख है। वहीं चूरू जिले के गुडान गांव के किसान महावीर सिंह आर्य की गेहूं की किस्म ‘एमके क्रांति’ का आवेदन 20 जुलाई 2009 को हुआ और इसका पंजीकरण 2 मार्च 2022 को दर्ज किया गया। आर्य को प्राधिकरण की Plant Genome Saviour Farmer Award सूची में भी स्थान मिला है।
देश में 10,802 प्रमाणपत्र, अनाज सबसे आगे
अगस्त 2020 तक जारी 4,199 प्रमाणपत्रों में 1,753 व्यक्तिगत किसानों अथवा किसान समुदायों, 1,292 सार्वजनिक शोध संस्थानों/कृषि विश्वविद्यालयों और 1,154 निजी बीज कंपनियों को मिले थे। इसी अवधि तक 952 किसान किस्में पंजीकृत थीं। 31 जुलाई 2026 तक प्राधिकरण के अनुसार कुल 10,802 प्रमाणपत्र जारी हो चुके हैं। इनमें अनाज की 6,246, सब्जियों की 1,367, रेशेदार फसलों की 989, दलहनी फसलों की 866, तिलहनी की 577 और मसाला फसलों की 151 किस्में शामिल हैं।
पेटेंट नहीं, किसान किस्म का पंजीकरण
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार इसे सामान्य अर्थों में ‘पेटेंट’ कहना सही नहीं है। PPV&FR Act, 2001 के तहत किसान अपनी विकसित अथवा संरक्षित किस्म को Farmers’ Variety के रूप में पंजीकृत करा सकता है। इससे किसान के अधिकार और पारंपरिक कृषि जैव-विविधता का कानूनी रिकॉर्ड तैयार होता है। प्रदेश में कृषि विभाग और कृषि विश्वविद्यालय पारंपरिक बीजों और स्थानीय फसल किस्मों की पहचान, दस्तावेजीकरण और पंजीकरण को बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रहे हैं। विभाग का मानना है कि स्थानीय किस्मों का पंजीकरण होने से कृषि जैव-विविधता का संरक्षण होगा और किसानों को उनकी पारंपरिक किस्मों पर कानूनी पहचान व अधिकार मिल सकेंगे।
राजस्थान के लिए चुनौती
बाजरा, ज्वार, गेहूं, दालों, तिलहन और मसाला फसलों की स्थानीय किस्मों की व्यापक पहचान कर उन्हें PPV&FRA के रिकॉर्ड में लाना राजस्थान के लिए चुनौती है। इसके लिए जिला स्तर पर किसान-किस्म सर्वे की जरूरत बताई जा रही है।

