उदयपुर में जगदीश चौक से उदयसागर तक बिखरी है कान्हा की प्राचीन विरासत
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देवस्थान विभाग के रिकॉर्ड में सामने आए कृष्ण के अलग-अलग स्वरूपों वाले मंदिर; कई मंदिर आज भी गुमनाम, राजपरिवार और वैष्णव परंपरा से जुड़ी है कहानी
जन्माष्टी विशेष
सुभाष शर्मा
उदयपुर, 3 सितंबर: झीलों की नगरी उदयपुर को दुनिया मेवाड़ के महलों, झीलों और ऐतिहासिक इमारतों के लिए जानती है, लेकिन शहर की पुरानी गलियों और आसपास के क्षेत्रों में भगवान श्रीकृष्ण की ऐसी धार्मिक विरासत छिपी हुई है, जिसकी जानकारी बहुत कम लोगों को है। राजस्थान देवस्थान विभाग के आधिकारिक रिकॉर्ड की पड़ताल करने पर उदयपुर जिले में भगवान कृष्ण को समर्पित अथवा कृष्ण स्वरूप से जुड़े 15 से अधिक मंदिरों के नाम सामने आते हैं। खास बात यह है कि इनमें बड़ी संख्या पुराने शहर के जगदीश चौक-बड़ीपोल क्षेत्र में केंद्रित है।
सबसे बड़ा सुराग : एक ही इलाके में कृष्ण के कई मंदिर
देवस्थान विभाग की आत्मनिर्भर श्रेणी वाली सूची में बड़ीपोल के बाहर और जगदीश चौक क्षेत्र में गुलाबस्वरूप बिहारी जी, श्यामसुंदर जी, गोकुल चन्द्रमा जी, वृन्दावन चन्द्रमा जी, जवानसूरज बिहारी जी उर्फ बांकेबिहारी जी और जवानस्वरूप बिहारी जी जैसे कृष्ण मंदिर दर्ज हैं। इसी सूची में जगत शिरोमणि और जगन्नाथ राय जी यानी जगदीश मंदिर भी दर्ज हैं। यह तथ्य अपने आप में उदयपुर की धार्मिक विरासत की एक अलग तस्वीर पेश करता है। आज जिस जगदीश चौक को पर्यटक शहर के सबसे प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थलों में गिनते हैं, उसी क्षेत्र में कभी मंदिरों और हवेलियों के बीच कृष्ण भक्ति की एक पूरी धार्मिक दुनिया विकसित हुई थी।
जगदीश मंदिर : विष्णु के साथ गिरधर गोपाल
उदयपुर का जगदीश मंदिर इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है। देवस्थान विभाग के अनुसार मंदिर का निर्माण महाराणा जगत सिंह प्रथम ने विक्रम संवत 1684 में शुरू कराया और विक्रम संवत 1709 में इसकी प्रतिष्ठा हुई। विभाग इसे करीब 400 वर्ष पुराना मंदिर बताता है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि गर्भगृह में भगवान श्री विष्णु यानी जगन्नाथ राय जी के साथ श्री गिरधर गोपाल अर्थात भगवान श्रीकृष्ण और महालक्ष्मी जी के विग्रह भी विराजमान हैं। जगदीश मंदिर केवल विष्णु मंदिर नहीं, बल्कि इसकी आंतरिक धार्मिक संरचना में कृष्ण आराधना की भी स्पष्ट उपस्थिति है।
जगत शिरोमणि : रानी की कृष्ण भक्ति की निशानी
बड़ीपोल के बाहर स्थित जगत शिरोमणि मंदिर सीधे भगवान कृष्ण और राधिका को समर्पित है। देवस्थान विभाग के अनुसार इसका निर्माण महाराणा स्वरूप सिंह ने वर्ष 1846 में कराया था। मंदिर के निर्माण के पीछे महारानी बाघेलीजी की भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप के प्रति गहरी भक्ति को कारण बताया गया है। मंदिर में कृष्ण की काले पत्थर की और राधिका की सफेद पत्थर की प्रतिमा है। मंदिर पुष्टिमार्गीय वैष्णव परंपरा से संबंधित है। जन्माष्टमी, अन्नकूट, नंद महोत्सव, फागोत्सव और होली जैसे पर्व यहां धार्मिक परंपरा के साथ मनाए जाते हैं।
उदयपुर के रिकॉर्ड में दर्ज कृष्ण मंदिर
देवस्थान विभाग की उपलब्ध सूचियों में उदयपुर शहर और आसपास के क्षेत्र में ये कृष्ण मंदिर दर्ज मिलते हैं—
श्री जगन्नाथ राय जी (जगदीश मंदिर) — जगदीश चौक
श्री जगत शिरोमणि जी — बड़ीपोल के बाहर
श्री गुलाबस्वरूप बिहारी जी — बड़ीपोल के बाहर, जगदीश चौक
श्री श्यामसुंदर जी — बड़ीपोल के बाहर, जगदीश चौक
श्री गोकुल चन्द्रमा जी — बड़ीपोल के बाहर, जगदीश चौक
श्री वृन्दावन चन्द्रमा जी — बड़ीपोल के बाहर, जगदीश चौक
श्री जवानसूरज बिहारी जी उर्फ बांकेबिहारी जी — जगदीश चौक
श्री जवानस्वरूप बिहारी जी — जगदीश चौक
श्री सरदार स्वरूप श्याम जी — मांजी का मंदिर, पिछोला की पाल
श्री अभयस्वरूप बिहारी जी — मांजी की बावड़ी, घंटाघर के पास
श्री मदन मोहन लाल जी — घोणेराव जी घाटी
श्री भीम मोहन लाल जी — रावजी का हाटा
श्री एजनस्वरूप बिहारी जी — गोवर्धन विलास
श्री उदयश्याम जी — उदयसागर की पाल
श्री उदयश्याम जी व मुरली मनोहर जी — फिरंगी घाट
श्री नवल श्याम जी — जगदीश चौक
श्री उम्मेद बिहारी जी व हनुमान जी — जगदीश चौक
श्री लाखनश्याम जी — उथरदा, गिर्वा
देवस्थान विभाग की प्रत्यक्ष प्रभार सूची में उदयपुर के उदयश्याम-मुरली मनोहर, नवल श्याम, उम्मेद बिहारी और लाखनश्याम मंदिर भी कृष्ण मंदिर के रूप में दर्ज हैं।
नामों में छिपी है कृष्ण की पूरी लीला
इन मंदिरों के नामों पर गौर करें तो भगवान कृष्ण के अनेक स्वरूप सामने आते हैं—श्यामसुंदर, बिहारी, गोकुल चन्द्रमा, वृन्दावन चन्द्रमा, बांकेबिहारी, मदन मोहन, मुरली मनोहर और गिरधर गोपाल। अर्थात उदयपुर में कृष्ण केवल एक नाम या एक प्रतिमा तक सीमित नहीं रहे। अलग-अलग मंदिरों में उनकी अलग-अलग लीलाओं और स्वरूपों की आराधना की परंपरा विकसित हुई।
पिछोला से उदयसागर तक पहुंची कृष्ण भक्ति
देवस्थान विभाग के रिकॉर्ड में कृष्ण मंदिर केवल पुराने शहर तक सीमित नहीं हैं। सरदार स्वरूप श्याम जी मंदिर पिछोला की पाल पर दर्ज है, जबकि उदयश्याम जी मंदिर उदयसागर की पाल पर दर्ज है। गोवर्धन विलास में एजनस्वरूप बिहारी जी और उथरदा में लाखनश्याम जी का मंदिर भी सूची में शामिल है। इससे यह संकेत मिलता है कि कृष्ण भक्ति की परंपरा पुराने राजमहल क्षेत्र से निकलकर उदयपुर के जलाशयों, घाटों और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों तक फैली हुई थी।
सबसे बड़ा सवाल : इन मंदिरों का इतिहास कहां दर्ज है?
यही इस पूरी पड़ताल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। देवस्थान विभाग की सूची में मंदिरों के नाम और स्थान दर्ज हैं, लेकिन कई छोटे कृष्ण मंदिरों के निर्माण वर्ष, संस्थापक, प्रतिमाओं की स्थापना और उनसे जुड़ी राजपरिवार की परंपराओं का विस्तृत इतिहास सार्वजनिक रूप से आसानी से उपलब्ध नहीं है।यहीं से एक नई ऐतिहासिक खोज की जरूरत पैदा होती है। पुराने राजस्व रिकॉर्ड, देवस्थान विभाग की मंदिर फाइलें, मंदिरों की बहियां, शिलालेख, राजपरिवार के दस्तावेज और स्थानीय परिवारों के पास सुरक्षित पुराने दस्तावेजों को खंगाला जाए तो उदयपुर की कृष्ण भक्ति की कहानी और भी पुरानी निकल सकती है।
बने ‘कृष्ण विरासत मार्ग’ तो बदलेगी तस्वीर
पं. प्रदीप द्विवेदी का कहना है कि उदयपुर में पर्यटन पहले से ही मजबूत है। ऐसे में “कृष्ण विरासत मार्ग” विकसित किया जाए तो पर्यटकों को एक नया धार्मिक-सांस्कृतिक सर्किट मिल सकता है। जगदीश चौक से शुरुआत कर बड़ीपोल, जगत शिरोमणि, मांजी की बावड़ी, पिछोला की पाल, घोणेराव जी घाटी, गोवर्धन विलास और उदयसागर की पाल तक मंदिरों को एक विरासत मार्ग से जोड़ा जा सकता है।यह केवल धार्मिक पर्यटन नहीं होगा। इसके माध्यम से मेवाड़ की स्थापत्य कला, राजपरंपरा, पुष्टिमार्ग, लोकभक्ति और कृष्ण संस्कृति को भी एक साथ प्रस्तुत किया जा सकता है।

