वन्दे मातरम्’ भारत की प्राण शक्ति, आज भी प्रासंगिक : धर्मराज
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कुशलबाग मैदान में एक समय, एक लय और एक स्वर में विद्यार्थियों ने किया राष्ट्रगीत का सामूहिक गायन
बांसवाड़ा, 26 सितम्बर: राष्ट्रगीत ‘वन्दे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में शनिवार को देशभर में एक समय, एक लय और एक स्वर में सामूहिक गायन कार्यक्रम आयोजित किया गया। विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान, नई दिल्ली के आह्वान पर बांसवाड़ा में जिला स्तरीय कार्यक्रम कुशलबाग मैदान में हुआ। इसमें विभिन्न राजकीय एवं निजी विद्यालयों तथा महाविद्यालयों के विद्यार्थी, शिक्षक, प्रधानाचार्य और अभिभावक शामिल हुए।
कार्यक्रम में विद्यार्थियों और उपस्थित लोगों ने सामूहिक रूप से राष्ट्रगीत का गायन किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता नगर परिषद सभापति मुकेश रावत ने की। जिला कलेक्टर इंद्रजीत सिंह यादव मुख्य अतिथि रहे। भारतमाता परियोजना बांसवाड़ा के प्रमुख धर्मराज मुख्य वक्ता थे।
धर्मराज ने ‘वन्दे मातरम्’ के इतिहास की जानकारी देते हुए बताया कि इसकी रचना का काल 1875-76 माना जाता है। इसके रचनाकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय थे और इसका प्रकाशन 1882 में उपन्यास ‘आनंदमठ’ में हुआ। वर्ष 1896 में कांग्रेस अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसका सार्वजनिक गायन किया। इसके बाद यह स्वाधीनता आंदोलन में राष्ट्रीय चेतना का प्रमुख उद्घोष बना।
धर्मराज ने कहा कि ‘वन्दे मातरम्’ केवल गीत नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना और मातृभूमि के प्रति समर्पण का भाव है। यह आज भी प्रासंगिक है और नई पीढ़ी को देश के इतिहास व गौरव से जोड़ने का माध्यम है।
कलेक्टर यादव ने विद्यालयों में नियमित रूप से राष्ट्रगीत के गायन के साथ विद्यार्थियों को इसके भाव और अर्थ से परिचित कराने का आह्वान किया। कार्यक्रम में जिला मंत्री नवनीत शुक्ला, जिला संयोजक गजेन्द्र आचार्य सहित अन्य लोग मौजूद रहे।

