माही परियोजना से संभाग के 2453 गांवों तक पहुंचेगा पेयजल
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सिंचाई के साथ पेयजल आपूर्ति का भी बनेगी आधार, चार जिलों के गांवों को जोड़ने की तैयारी
भंवरलाल पांचाल, सेवानिवृत्त सहायक अभियंता, सिंचाई विभाग
उदयपुर, 31 अक्टूबर: दक्षिण राजस्थान की जीवनरेखा माही परियोजना अब खेतों की सिंचाई के साथ हजारों गांवों की प्यास बुझाने का भी आधार बनेगी। पीपलखूंट उच्च स्तरीय नहर परियोजना के तहत उदयपुर संभाग के प्रतापगढ़, उदयपुर, राजसमंद और चित्तौड़गढ़ जिलों के 2453 गांवों तक पेयजल पहुंचाने की योजना बनाई गई है। इसके लिए 79 किलोमीटर लंबी पेयजल पाइपलाइन प्रस्तावित है। इससे माही का पानी उन ग्रामीण इलाकों तक पहुंचाने की तैयारी है, जहां गर्मियों में पेयजल संकट बड़ी चुनौती रहता है।
पीपलखूंट उच्च स्तरीय नहर परियोजना से 24 गांवों की 5123 हेक्टेयर भूमि को सिंचाई सुविधा देने का भी प्रावधान है। वहीं बागीदौरा, कुशलगढ़, सज्जनगढ़ और गांगड़तलाई तहसीलों के 338 गांवों में 41,903 हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचाई का लाभ देने के लिए 103 किलोमीटर मुख्य नहर और 250 किलोमीटर वितरिकाओं का नेटवर्क तैयार किया गया है। यहां फव्वारा पद्धति से सिंचाई की योजना है।
नहरों का संचालन होगा तकनीक से
पानी के वितरण और निगरानी के लिए परियोजना में एससीएडीए प्रणाली अपनाई जाएगी। इससे नहरों में पानी के प्रवाह को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। ऊंचाई वाले क्षेत्रों तक पानी पहुंचाने के लिए सौर ऊर्जा संयंत्रों की भी योजना है। इससे सिंचाई और पेयजल आपूर्ति के साथ जल प्रबंधन को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है।
1960 में रखी गई थी आधारशिला
सिंचाई विभाग के सेवानिवृत्त सहायक अभियंता भंवरलाल पांचाल बताते हैं कि माही परियोजना की आधारशिला 7 मई 1960 को तत्कालीन केंद्रीय वित्त मंत्री मोरारजी देसाई ने रखी थी। गुजरात में कडाना बांध निर्माण के कारण राजस्थान के कुछ भूभाग और धार्मिक स्थलों के डूब क्षेत्र में आने की आशंका के बाद 1966 में दोनों राज्यों के बीच समझौता हुआ। वर्ष 1971 में योजना आयोग से मंजूरी मिलने के बाद परियोजना का निर्माण आगे बढ़ा। 1 नवंबर 1983 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने माही नहरों में पानी प्रवाहित करने का लोकार्पण किया। इसके बाद बांसवाड़ा और डूंगरपुर के किसानों को सिंचाई सुविधा मिलने का नया दौर शुरू हुआ।
500 मिलियन घनमीटर बरसाती पानी सहेजने की योजना
परियोजना के विस्तार में मानसून के दौरान अनास नदी से बहकर गुजरात की ओर जाने वाले पानी के उपयोग की भी योजना है। गराड़िया पिकअप वियर के माध्यम से पानी मोड़कर कृत्रिम जलाशयों तथा जाखम और सोम-कमला-अंबा बांधों में संग्रहित करने का प्रस्ताव है। इससे करीब 500.32 मिलियन घनमीटर अतिरिक्त पानी का उपयोग संभव हो सकेगा। इसका लाभ रबी की फसल की सिंचाई सहित अन्य जरूरतों में मिल सकता है। इस तरह माही परियोजना का स्वरूप अब सिंचाई से आगे बढ़कर पेयजल आपूर्ति और बरसाती पानी के संरक्षण तक विस्तारित हो रहा है। हालांकि 2453 गांवों तक पेयजल पहुंचाने का लक्ष्य योजनागत प्रावधान है, इसकी वास्तविक उपयोगिता क्रियान्वयन और समयबद्ध आपूर्ति पर निर्भर करेगी।

